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Hardoi News: सड़कों पर गूंज रहे प्रतिबंधित प्रेशर हॉर्न, कार्रवाई नहीं कर रहे जिम्मेदार

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हरदोई। जिले में बसों, ट्रकों और अन्य भारी वाहनों में प्रतिबंधित प्रेशर हॉर्न का इस्तेमाल लगातार बढ़ता जा रहा है। शहर के प्रमुख चौराहों और मार्गाें पर दिनभर तेज आवाज वाले हॉर्न गूंजते रहते हैं। नियमों के विपरीत हो रहे इस प्रयोग से ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है, वहीं राहगीरों, मरीजों, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद परिवहन विभाग और यातायात पुलिस की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही है।
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शहर के रेलवेगंज, सिनेमा चौराहा, घंटाघर, बस अड्डा, लखनऊ रोड, शाहजहांपुर रोड और हरदोई-सीतापुर मार्ग पर चलने वाले भारी वाहनों में प्रतिबंधित प्रेशर हॉर्न खुलेआम बजाए जा रहे हैं। जाम के दौरान चालक लगातार हॉर्न बजाते रहते हैं, जिससे आसपास का वातावरण शोरगुल से भर जाता है। सबसे अधिक परेशानी मेडिकल कॉलेज के जिला अस्पताल, महिला अस्पताल, स्कूलों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में देखने को मिल रही है, जहां साइलेंस जोन होने के बावजूद नियमों का पालन नहीं कराया जा रहा है।
लोगों का कहना है कि कई बार शिकायत के बाद भी संबंधित विभाग केवल औपचारिक चेकिंग अभियान चलाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं। नियमित कार्रवाई के अभाव में वाहन चालक बिना किसी डर के प्रतिबंधित हॉर्न का इस्तेमाल कर रहे हैं। ट्रक और निजी बसों को छोड़ दें तो कई रोडवेज बसों में भी प्रेशर हॉर्न लगा हुआ है और वह भी शोर मचाते हुए दौड़ती निकल जाती हैं। उप संभागीय परिवहन अधिकारी अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि प्रेशर हॉर्न पर पूरी तरह से रोक है। ऐसे वाहनों को पकड़ कर चालान किया जाता है।
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सिर दर्द और तनाव बढ़ाते प्रेशर हॉर्न
ईएनटी विशेषज्ञ विवेक सिंह ने बताया कि मनुष्य के कान अधिकतम 70 डेसीबल का शोर बर्दास्त कर सकते हैं। जबकि, 80 डेसीबल की ध्वनि सुनने की क्षमता को प्रभावित करती है। वहीं, प्रेशर हाॅर्न 160 डेसीबल तक का प्रेशर उत्पन्न करते हैं, जो काफी खतरनाक है। सामान्य हार्न की ध्वनि 40- 50 डेसीबल ही होनी चाहिए। मानकों के अनुसार दिन के समय 45 डेसीबल, जबकि रात के समय 35 डेसीबल तक की ध्वनि का मानक निर्धारित किया गया है। बताया कि ध्वनि प्रदूषण के कारण तनाव, सिरदर्द, सुनने की क्षमता पर असर, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगियों को परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
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