हरदोई। यह खबर किसानों को पढ़ने में भले ही नागवार लगे, पर चेत गए तो न सिर्फ आर्थिक लाभ होगा, बल्कि कृषि भूमि की उम्र भी बढ़ जाएगी। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि गेहूं की कटाई के बाद अगर खेत में पड़े डंठल को फूंक रहे हैं, तो डंठल नहीं, बल्कि खुद की तकदीर को धुआं कर रहे हैं।
गेहूं की कटाई होने के बाद अमूमन खेतों में आग की लंबी लौ को उठते हर किसी ने देखा होगा। यह आग खेतों में क्यों लगाई जाती है, तो यह बता दिया जाता है कि गेहूं क ी कटाई के बाद डंठल बचे थे, उनको जलाया जा रहा है, पर शायद आग लगाने वाले किसानों को खुद ही नहीं मालूम कि वह अपनी किस्मत को ही आग के हवाले कर रहे हैं। इस बाबत जिला कृषि अधिकारी अमर सिंह का कहना है कि डंठल के साथ फसल की सबसे पोषक तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश के साथ मित्र वैक्टीरिया और फ फूंद भी जल रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि भूसे के रूप में पशुओं का हक तो मारा जा रहा, भूमि की उर्वरक क्षमता को भी कम किया जा रहा है।
कृषि अधिकारी अमर सिंह का कहना है कि समय-समय पर होने वाले सेमिनार आदि द्वारा दी जाने वाली जानकारियों से कहा जा सकता कि प्रदेश में गेहूं और धान करीब 700 टन डंठल को खेतों में ही फूं क दिया जाता है। सर्वाधिक रकवा होने से गेहूं के डंठल सर्वाधिक फुंक जाते हैं। डा. मुकेश का कहना है कि कंबाइन से कटाई के बाद हाल के वर्षों में डंठल को नष्ट करना अब आम हो गया है। शोधों के मुताबिक इन डंठलों में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की मात्रा 0.5, 0.6 एवं 1.5 फीसदी होती है। इन्हें जलाने की बजाए यदि खेत में ही कंपोस्ट बना दिया जाए, तो खेतों को पोषक तत्व उसी समय प्राप्त हो सकते हैं।
उनका कहना है कि मसलन फसलों के अवशेष से ढकी मिट्टी का तापमान सम रहने से सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ जाती है, जो अगली फसल के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व मुहैया करते हैं। फसल का पाले व लू जैसी प्राकृतिक प्रकोपों से बचाव होता है। नमी संरक्षित रहने से सिंचाई कम करनी पड़ती है। भूमि की जलधारणा की क्षमता बढ़ती है। उर्वरकों के प्रयोग में करीब 25 फीसदी की कमी आती है। किसानों को चाहिए कि डंठलों को न जलाएं।