नारों और मुद्दों से ज्यादा इस वक्त नेताओं और दलों को जाति-धर्म के गणित और समीकरणों पर भरोसा है। टेबल पर जीत की रणनीति, नेताओं की सभाएं कहां और कितनी होंगी, किस सभा में किस अंदाज में बोलना है, कहां जाति धर्म पर पर बोलना है और कहां रोजगार की बातें करनी है? इन्हीं सभी बातों पर प्रचार की रणनीति टिकी है।
मिशन 2017 में जीत के लिए हर दल ने बदले जमाने के हिसाब से नारे और जुमले तैयार किए हैं। हालांकि नए नारों के बावजूद दलों और प्रत्याशियों के मुद्दों में खास बदलाव नहीं दिख रहा है। दरअसल दलों ने जाति-धर्म के गणित पर ही सबसे ज्यादा फोकस किया है।
हर दल ने उम्मीद लगाई है कि उसके साथ किस जाति-धर्म का वोट आ सकता है और इसमें उम्मीदवार की जाति की अहमियत क्या हो सकती है?
कई दलों ने प्रत्याशियों के चुनाव में जबरदस्त कास्ट फैक्टर जोड़ा है। रालोद ने हापुड़ सुरक्षित सीट से अंजू मुस्कान को प्रत्याशी बनाया है। अंजू दलित हैं और उनके पति मुस्लिम हैं। रालोद का गणित है कि दलित प्रत्याशी, पति मुस्लिम और जाट पार्टी का बेस मिलकर उन्हें जादुई आंकड़ा मिल जायेगा।
लोकसभा चुनाव की तरह बीजेपी ने इस बार भी बीएसपी को कमजोर करना चाहती है। ऐसे में बसपा को टारगेट करते हुए भी नारे गढ़े गए हैं। ऐसा ही एक नारे में कहा गया है, घोटालों की भरमार, नहीं चाहिए बीएसपी सरकार। सपा-कांग्रेस के साथ आने पर भाजपा ने नारा दिया है पंजा, साइकिल और हाथी, सब भ्रष्टाचार के साथी, कमल खिलाएं यूपी बचाएं।
सपा ने भी नए अंदाज वाले नारे गढ़े हैं, सपा-कांग्रेस साथ आए तो कांग्रेस ने 27 साल यूपी बेहाल नारे पर पेंट पोत दिया। अब नया नारा है यूपी को ये साथ पसंद है। काम बोलता है पर भी सपा पूरा फोकस कर रही है। कर्जा माफ, बिजली बिल हाफ, एमएसपी का करो हिसाब। गरीबों से खींचो, अमीरों को सींचो और सूट बूट की सरकार, रुलाए गरीबों को बार-बार जैसे नारों पर कांग्रेस का फोकस है।
बसपा भी नारों की इस होड़ में पीछे नहीं है। बेटियों को मुस्कुराने दो, बहनजी को आने दो। बहनजी को आने दो प्रदेश को गुंडे-माफिया से बचाने को, गांव-गांव को शहर बनाने दो, बहनजी को आने दो। डर से नहीं हक से वोट दो, बेईमानों को चोट दो। कमल, साइकिल, पंजा होगा किनारे, यूपी चलेगा हाथी के सहारे जैसे नए नारों के साथ बसपा मैदान में आई है।