कारगिल विजय दिवस पर विशेष
गढ़मुक्तेश्वर। पाकिस्तान से हुए कारगिल युद्ध में गणों की मुक्ति धाम से गढ़ तहसील क्षेत्र का नाम भी जुड़ा हुआ है। क्षेत्र की मिट्टी में पैदा हुए गांव लुहारी के जवान सतपाल सिंह ने भी विरोधियों से लोहा लेते हुए अपने प्राणों को न्यौछावर किया था। गांव में आज भी सतपाल सिंह के नाम को बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। सतपाल सिंह के शहीद होने के बाद उनके परिवार में अब उनकी पत्नी के अलावा एक बेटी और एक बेटा है।
लुहारी निवासी दलेल सिंह के चार बेटे थे। इनमें बड़े बेटे गजेंद्र सिंह फौज में थे। उनसे छोटे धर्मवीर सिंह, सतवीर सिंह और सतपाल सिंह किसान थे। बड़े भाई गजेंद्र सिंह को मां भारती की सेवा करते देख सतपाल सिंह ने भी सेना में भर्ती होने की ठान ली और वह भी सेना में भर्ती हो गए। जिसके कुछ ही समय बाद उनकी शादी मेरठ निवासी बबीता से हो गई। जनवरी 1999 में वह छुट्टी के बाद ग्वालियर पहुंचे तो वहां से जम्मू के लिए तबादला हो गया। बटालियन जम्मू पहुंची ही थी कि इसी बीच कारगिल की जंग शुरू हो गई। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूताना राइफल्स को फौरन कारगिल पहुंचने के आदेश हुए। सतपाल सिंह लड़ाई में गए हैं, इसकी जानकारी उनके घर पर किसी को नहीं थी। इसी बीच उनकी यूनिट के तीन साथी चमन, सुरेंद्र और जसवीर कारगिल में शहीद हुए तो पूरे इलाके में खबर फैल गई। जैसे ही यह सूचना लुहारी में पहुंची तो सतपाल के परिवार को भी चिंता होने लगी। दो जुलाई को गांव में थाने से एक सिपाही लांस नायक सतपाल सिंह के घर पहुंचे तो सब बेचैन हो गए। कुछ देर बैठने के बाद सिपाहियों ने बताया कि सेना मुख्यालय से खबर आई कि 28 जून को लांस नायक सतपाल सिंह द्रास सेक्टर में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए। लांस नायक सतपाल सिंह जब शहीद हुए तो उनकी उम्र 28 साल थी। बड़ा बेटा पुलकित साढ़े तीन साल और बेटी दिव्या ढाई साल की थी। सेना ने उनकी काफी मदद की। यूनिट के अफसर उन्हें भगत लाइंस ले गए। यहां पर वे 11 महीने रहे, इसके बाद उनको तोपखाना में आवास मिल गया। छह साल तक वहां रहने के बाद फिर सतपाल के परिजन कंकरखेड़ा डिफेंस एनक्लेव में जाकर रहने लगे।