समाजवादी पार्टी का रालोद से गठबंधन नहीं होने पर हापुड़ विधान सभा सीट पर भाजपा को लाभ मिल सकता है। हापुड़ सीट पर रालोद का रोल महत्वपूर्ण रहने की संभावना है। राष्ट्रीय लोकदल में अधिकांश मतदाता जाट हैं।
हालांकि जाटों के अलावा अन्य जातियों त्यागी, ब्राह्मण, ठाकुर और मुस्लिम किसान भी रालोद से काफी जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि रालोद के पास भी मतदाताओं का ठीकठाक वोट बैंक है।
पिछले विधान सभा चुनाव में रालोद ने कांग्रेस से गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। ऐसे में बसपा से जुड़े मुस्लिम मतदाताओं ने भी एनवक्त पर पाला बदलकर कांग्रेस को वोट दिया था,
क्योंकि उन्हें हापुड़ विधान सभा क्षेत्र के करीब 30 हजार जाट मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की ओर दिखायी पड़ रहा था। नतीजतन, मतदान के दिन बसपा प्रत्याशी धर्मपाल सिंह के हाथों से अचानक मुस्लिम वोट बैंक खिसक गया और उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा।
जबकि वह दो बार आसानी से बसपा के विधायक चुने गए थे। यूपी में इस बार कांग्रेस ने रालोद से नहीं बल्कि सपा से गठबंधन किया है। हालांकि पहले रालोद की इन दोनों दलों से गठबंधन की वार्ता चल रही थी,
लेकिन मुजफ्फरनगर कांड को लेकर सपा ने रालोद से गठबंधन करने से फिलहाल हाथ खींच लिया है। ऐसे में रालोद से जुड़े मतदाता गुस्से में कांग्रेस और सपा गठबंधन प्रत्याशी को कम वोट देकर अपने नेता के अपमान का बदला लेने का हर संभव प्रयास करेंगे।
फिलहाल कांग्रेस से गजराज सिंह और सपा से तेजपाल प्रमुख के नाम हापुड़ विधान सभा सीट से घोषित हैं। माना जा रहा है कि वर्तमान कांग्रेस विधायक गजराज सिंह को ही गठबंधन का टिकट मिलेगा क्योंकि वह राजनैतिक अनुभव के आधार पर तेजपाल पर भारी पड़ रहे हैं,
लेकिन अगर रालोद का कांग्रेस, सपा से गठबंधन नहीं हुआ तो गजराज सिंह को जीतने के लिए एड़ी चोटी के जोर लगाने होंगे। क्योंकि ऐसे में रालोद समर्थित मतदाता निर्णायक भूमिका में आ जाएंगे और इसका लाभ भाजपा को भी मिल सकेगा।
इसका कारण यह है कि रालोद कार्यकर्ताओं का बसपा कार्यकर्ताओं से हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहता है। वैसे भी बसपा के घोषित प्रत्याशी श्रीपाल राजनीति में नए हैं। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि हापुड़ विधान सभा सीट पर रोचक मुकाबला देखने को मिलेगा, प्रत्याशी कोई भी हो।