आधी आबादी की सियासत में भागीदारी की बात राजनीतिक दल और नेता करते तो रहे हैं, लेकिन पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि लोकतंत्र के पर्व में आधी आबादी की अनदेखी होती रही है। आजादी के बाद 1951 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में हापुड़ सीट पर एक महिला प्रत्याशी ने परचम लहराया था।
इसके बाद से तमाम कोशिशों के बाद भी किसी महिला प्रत्याशी ने जीत दर्ज नहीं की। इस बार फिर हापुड़ और गढ़मुक्तेश्वर सीट पर दो महिला प्रत्याशी अपना भाग्य आजमा रही हैं। राजनैतिक दल महिलाओं के सशक्तीकरण के प्रति कितने संवेदनशील हैं,
यह इस बार के विधान सभा चुनाव में देखा जा सकता है। जिले में महिलाओं ने समय-समय पर अपनी कार्य क्षमता का परिचय दिया है, लेकिन प्रत्याशी बनने की दौड़ में वह हाशिये पर दिख रही हैं। महिलाओं के राजनैतिक आरक्षण की वकालत करने वाले दलों ने इस बार भी उन्हें टिकट से वंचित रखा है।
हापुड़ विधान सभा सीट पर आजादी के बाद हुए वर्ष 1951 के विधान सभी चुनाव में प्रकाशवती कांग्रेस के टिकट से विजयी रहीं। इस चुनाव के बाद एक भी महिला विधायक नहीं बन सकी। 1951 के चुनाव में विद्यावती भी चुनाव मैदान में थीं, लेकिन वह हार गई थीं।
1980 में गढ़ से अकूलिया बेगम निर्दलीय चुनाव लड़ी थीं, उन्हें मात्र 149 मत मिले थे। 1989 के चुनाव में गढ़ से जन्नत चुनाव लड़ीं, उन्हें 24 मत मिले। 1993 में हापुड़ से निर्दलीय भगवती चुनाव लड़ीं, उन्हें 200 और पुष्पा को 184 मत मिले।
2007 के चुनाव में जनता दल (एस) से मिथलेश को 618 मत मिले थे जबकि गढ़ सीट से नेशनल लोक हिंद पार्टी से लड़ी बबीता को 9,355 मत मिले थे। 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी से किरन आरसी जाटव को 8910, आरएलएम से कविता सिंह का 475 मत मिले थे।
इस बार के विधान सभा चुनाव में भाजपा, बसपा, सपा, कांग्रेस जैसे बड़े दलों ने किसी भी महिला प्रत्याशी पर भरोसा नहीं किया। जबकि हापुड़ सीट से रालोद से अंजू मुस्कान और अमृता कुमार निर्दलीय मैदान में हैं।