मोनाड विश्वविद्यालय मामला
पिलखुवा। मोनाड विश्वविद्यालय में फर्जी डिग्री बांटने के मामले में आरोपियों की पेशी 13 जून को होगी। इस घोटाले के बाद से विश्वविद्यालय की मान्यता पर सवाल उठने लगे हैं। बताया जा रहा है कि 2011 में स्थापना के बाद से विश्वविद्यालय का यूजीसी से सत्यापन नहीं हुआ है। मामले में यूजीसी और विश्वविद्यालय प्रबंधन की ओर से 10 साल से केवल पत्राचार ही चल रहा है।
हालांकि मामला हजारों छात्रों के भविष्य से जुड़ा होने और किसी प्रकार के हंगामे को देखते हुए यह पेशी ऑनलाइन भी हाे सकती है। इसके साथ ही एसटीएफ ने चार्जशीट दाखिल करने के लिए अपनी जांच तेज कर दी है। एसटीएफ ने इसके लिए असलम खान को अधिवक्ता नियुक्त किया है। वहीं अब विवि की मान्यता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।
मामले के खुलासे के बाद एसटीएफ ने अपनी जांच तेज कर दी है। गिरफ्तारी के 28 दिन बाद एसटीएफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करेगी। इससे पहले 13 जून को आरोपियों को कोर्ट में पेशी होगी। हालांकि बताया जा रहा है कि हजारों छात्रों से मामला जुड़ा होने के कारण यह पेशी ऑनलाइन भी हो सकती है। उधर, विश्वविद्यालय की मान्यता पर भी सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं। इसका खामियाजा हजारों छात्रों को भुगतना पड़ सकता है। जानकारों की माने तो इस मामले में विश्वविद्यालय प्रबंधन की साजिश और यूजीसी की मिलीभगत सामने आ रही है। एसटीएफ ने यूजीसी और विश्वविद्यालय प्रबंधन को पत्र भेजकर मामले में जानकारी मांगी है। मानकों के अनुसार 60 एकड़ जमीन व अन्य औपचारिकता पूरी करने के बाद मान्यता के लिए आवेदन किया जाता है। विधानसभा में स्वीकृति के बाद राज्यपाल की ओर से संबंधित एजेंसी-व्यक्ति को विश्वविद्यालय खोलने की अनुमति दी जाती है। विश्वविद्यालय को बनाने के लिए सरकार की ओर से पांच साल का समय दिया जाता है। इसके लिए मोनाड ने 2016 में आवेदन किया था। आवेदन के बाद विश्वविद्यालय में एक्सपर्ट की टीम भेजी जानी थी। इसके लिए यूजीसी की ओर से कुछ दस्तावेज और उपलब्ध कराने के लिए कहा था, लेकिन विश्वविद्यालय की तरफ से कागजात उपलब्ध नहीं कराए गए और न ही यूजीसी की तरफ से कोई आपत्ति दर्ज कराई गई।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एम जावेद का कहना है कि 2016 के बाद से यूजीसी की ओर से हर साल कुछ जानकारी मांगी जाती हैं, जिसे भेज दिया जाता है। विश्वविद्यालय से जारी सभी दस्तावेज और मार्कशीट वैध हैं।
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