हापुड़ और गढ़ की जनता ने एक बार ही जताया निर्दलीय प्रत्याशी पर भरोसा
हापुड़। विधानसभा चुनावों में प्रत्याशियों के बीच मुकाबला शुरू से ही रोमांचक रहा है। इन चुनावों में राजनीतिक दलों के अलावा निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी जीत हासिल की है। हालांकि हापुड़ और गढ़ सीट पर एक-एक बार ही प्रत्याशी चुनाव जीते हैं। वर्ष 1962 में हापुड़ विधानसभा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी प्रेम सुंदर ने कांग्रेस प्रत्याशी कैलाश प्रकाश को 449 वोट और गढ़ में वर्ष 1997 में निर्दलीय प्रत्याशी बी. सिंह आरपीआई पार्टी के प्रत्याशी मनसाब को हराया था।
आजादी के बाद वर्ष 1951 में हुए पहले हापुड़ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपना खाता खोला और लगातार दो बार जीत हासिल की। वर्ष 1962 में तीसरी बार निर्दलीय प्रत्याशी ने कांग्रेस की जीत का सिलसिला तोड़ दिया। उस समय चुनाव में खड़े हुए निर्दलीय प्रत्याशी प्रेम सुंदर ने कांग्रेस प्रत्याशी कैलाश प्रकाश को 449 वोटों से हरा दिया था। उस चुनाव में दोनों प्रत्याशियों की कड़ी टक्कर थी।
वहीं गढ़ विधानसभा सीट पर भी वर्ष 1962 को हुए पहले चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी ने अपना खाता खोला। इसके बाद वर्ष 1997 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी बी. सिंह ने 27003 वोट हासिल कर शानदार जीत हासिल की थी। उनके सामने विभिन्न दलों से चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को बेहद कम वोट मिले थे। उस चुनाव में दूसरे नंबर पर आरपीआई पार्टी के प्रत्याशी मनसाब को 20276 वोट प्राप्त हुए थे जबकि, कांग्रेस प्रत्याशी एस. हुसैन 13638 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे।
उसके बाद से अभी तक हापुड़ और गढ़मुक्तेश्वर विधानसभा क्षेत्र के लोगों को कोई भी निर्दलीय प्रत्याशी रास नहीं आया है। इस बार भी चुनावी मुकाबला और रोमांचक होने की उम्मीद है। आजादी के बाद से अब तक हुए हापुड़ विधानसभा सीट पर 17 विधानसभा चुनाव में से 16 बार और गढ़ सीट पर 15 में से 14 बार जनता राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों के साथ रही है।
दोनों सीटों पर 1993 में सबसे अधिक खड़े हुए थे निर्दलीय उम्मीदवार
राममंदिर आंदोलन होने के बाद वर्ष 1993 में हापुड़ और गढ़मुक्तेश्वर विधानसभा सीट पर सबसे अधिक निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव में खड़े हुए थे। हापुड़ विधानसभा सीट से कुल 17 प्रत्याशी खड़े हुए थे इनमें से 11 निर्दलीय प्रत्याशी थे। जबकि गढ़ विधानसभा सीट पर कुल 30 प्रत्याशी खड़े हुए थे, इनमें से 20 निर्दलीय थे। उस दौरान चुनाव में बड़ी बात यह रही थी कि हापुड़ सीट पर 13 और गढ़ सीट पर 25 प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे।
1993 के बाद निर्दलीय प्रत्याशियों की कम हुई संख्या
साल 1993 के बाद वर्ष 1996 में हुए चुनाव से निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई। 1996 में हापुड़ सीट से दो और गढ़ सीट से केवल पांच निर्दलीय प्रत्याशी ही खड़े हुए थे। इसके बाद वर्ष 2017 तक हुए चुनाव तक संख्या में गिरावट ही आती चली गई।
1969 में कोई नहीं था निर्दलीय
वर्ष 1969 में हुए विधानसभा चुनाव में हापुड़ सीट पर कुल सात प्रत्याशी खड़े हुए थे। सभी प्रत्याशी दलों के चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़े थे। उस चुनाव में कोई भी निर्दलीय प्रत्याशी नहीं खड़ा हुआ था। जबकि गढ़ विधानसभा में केवल एक ही प्रत्याशी निर्दलीय चुनाव लड़ा था।
इस प्रकार रहीं निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या
वर्ष विधानसभा सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या
1951 11
1957 02
1962 04
1967 12
1969 01
1974 08
1977 09
1980 11
1985 13
1989 17
1991 26
1993 31
1996 07
2002 04
2007 02
2012 10
2017 09