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काला गेहूं किसानों को पड़ रहा भारी, नहीं मिल रहे खरीदार

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hapur news - फोटो : HAPUR
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काला गेहूं किसानों को पड़ रहा भारी, नहीं मिल रहे खरीदार
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हापुड़। खेती से किस्मत चमकाने का सपना देख काले गेहूं की बुवाई करने वाले किसानों के लिए यह फसल घाटे का सौदा बन गई है। जिले के किसी खरीद केंद्र पर इस प्रजाति के गेहूं को नहीं खरीदा जा रहा। जबकि काले गेहूं में कैंसर, मधुमेह जैसी बीमारियों को हराने के न्यूटरेंट होने का किसानों को भरोसा दिलाया गया जिसके बाद यह बीज बोया गया। लेकिन आईसीआर के मानक पर इस तरह का गेहूं खरा नहीं उतरा है, ऐसे में करीब दो हजार क्विंटल गेहूं बिक्री के लिए किसान भटक रहे हैं।
जिले में बड़े पैमाने पर गेहूं की खेती होती है। लेकिन इसमें सामान्य गेहूं की फसल को ही किसान अपनाते हैं। इस बार भी 45 हजार हेक्टेयर रकबे में सामान्य गेहूं की बुवाई हुई थी। जिसका उत्पादन भी बंपर रहा। लेकिन रिसर्च सेंटर से आए कुछ वैज्ञानिकों ने किसानों को काले गेहूं के इतने फायदे गिना दिए कि किसानों ने बाजार की चिंता किए बगैर ही करीब 20 हेक्टेयर रकबे में इसे उगा दिया।
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जिले के किसी सरकारी खरीद केंद्र पर इस गेहूं को खरीदे जाने का कोई आदेश ही नहीं है। ऐसे में किसान केंद्रों पर पहुंचते हैं लेकिन उन्हें मायूस लौटना पड़ रहा है। निजी बाजारों में भी इसका कोई खरीदार नहीं मिल रहा है।
एनजीओ ने उपलब्ध कराया बीज
हापुड़ के किसानों को यह बीज एक एनजीओ के माध्यम से उपलब्ध कराया गया था। अब किसान उक्त एनजीओ से संपर्क करते हैं तो वह कोई जवाब नहीं देती। ऐसे में जिले के किसान फंस गए हैं।
रिसर्च सेंटर के भरोसे पर किसानों ने बोई थी फसल
हापुड़ के किसानों को इस प्रजाति के गेहूं की कोई जानकारी नहीं थी। मौहाली स्थित एक प्राइवेट रिसर्च सैंटर से आए वैज्ञानिकों ने हापुड़ के किसानों को इसकी जानकारी दी। जिसके बाद किसानों ने करीब 18 हेक्टेयर रकबे में इस फसल की बुवाई की।
सामान्य गेहूं से चार गुना दाम का दिलाया था भरोसा
काले गेहूं की बुवाई से पहले किसानों को यह बताया गया था कि इस प्रजाति के गेहूं का उत्पादन सामान्य गेहूं से चार गुना तक होता है और बाजार में दाम भी कई गुना महंगा होता है। लेकिन दोनों की भरोसे किसानों पर भारी पड़ गए, न तो इसके खरीदार मिल रहे हैं और न ही उत्पादन कुछ खास रहा है।
काले गेहूं के बताए गए थे फायदे
किसानों को बताया गया था कि इस प्रजाति के गेहूं में एंटी ऑक्सीडेंट काफी मात्रा में हैं। जिसके प्रयोग से कैंसर, मधुमेह, तनाव और ह्दय रोगों पर अंकुश लग सकता है। यह भी बताया था कि इस प्रजाति के गेहूं का आटा 70 रुपये/किलोग्राम तक बिकता है। लेकिन इसका सब कुछ उल्ट हो रहा है।
सामान्य गेहूं से बताया था अलग
रिसर्च सेंटर से आए वैज्ञानिकों ने बताया था कि समान्य गेहूं में एंथोसाईनिन की मात्रा 15पीपीएम होती है, वहीं काले गेहूं में 140 पीपीएम तक होती है। जिंक की मात्रा भी इस गेहूं में अधिक होती है। वहीं इसमें पिगमेंट की मात्रा भी अधिक होती है। इसे नाबी एमजी के नाम से भी जाना जाता है।
40 किसानों ने उगाई है फसल-
जिले के करीब 40 किसानों ने यह फसल उगाई है, हालांकि पहली बार में कम ही गेहूं उगाया गया है। गढ़ क्षेत्र में ही इस फसल का अधिकांश क्षेत्रफल है। समस्याओं को देखकर आगे किसानों ने इसकी बुवाई से इंकार भी किया है।
गांव दयानगर निवासी किसान रविंद्र ने बताया कि उसने चार बीघा जमीन में काला गेहूं उगाया था। अब इसकी बिक्री के लिए वह भटक रहा है, लेकिन इसका कोई खरीदार नहीं मिल रहा है। जिला प्रशासन को इस समस्या का समाधान करना चाहिए।
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शासन से काला गेहूं खरीद के कोई आदेश नहीं मिले हैं, जिसके चलते केंद्रों पर इस तरह के गेहूं की खरीद नहीं की जा रही है। शासन से आदेश मिलने पर ही अग्रिम कार्रवाई होगी।--जिला विपणन अधिकारी, सुरेश यादव।
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