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कोर्ट से संसद तक उठी बात फिर भी साफ न हुई काली नदी

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कोर्ट से संसद तक उठी बात फिर भी साफ न हुई काली नदी
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हापुड़। काली नदी की सफाई के लिए कोर्ट से लेकर संसद तक आवाज उठ चुकी है। लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों की अनदेखी से यह नदी अपने स्वरूप को खोकर नाला बन गई है, जो अनेकों औद्योगिक इकाईयों के जहरीले वेस्टेज को ढोते-ढोते खुद जहरीली हो गई है, इसका असर किनारे बसें गांवों के लोगों के स्वस्थ पर भी पड़ने रहा है।
काली की स्वच्छता के लिए सड़क से एनजीटी कोर्ट तक लड़ाई लड़ने वाले पर्यावरण विद् और पूर्व जिला पंचायत सदस्य कृष्णकांत सिंह हूण बताते हैं कि नदियों की सफाई को लेकर सरकारी स्तर पर बड़ी दिशा हीनता है। सरकार का ध्यान गंगा, यमुना आदि नदियों को साफ करने पर है लेकिन सहायक नदियों और नालो को छोड़ देते हैं।
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जब तक काली नदी साफ नहीं होगी तब तक गंगा स्वच्छता की बात करना बेमानी है। इसे साफ करने से पहले इसमें गिरने वाले नालों को बंद करना होगा। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013 में एनजीटी में याचिका दायर कर प्रदूषण नियमों की अवेहलना करने वाली पशु वधशालाओं तथा अन्य औद्योगिक इकाइयों पर नियंत्रण की मांग की थी।
इस संबंध में वर्ष 2015 में कोर्ट ने आदेश जारी किए तथा नियमों की अवेहलना कर काली नदी में अपने गैर शोधित अपशिष्टों का निस्तारण करने वाली पशु वधशाला मेरठ नगर निगम तथा हापुड़ नगरपालिका को बंद करा दिया था तथा मेरठ, हापुड़ व गाजियाबाद की अनेकों पशुवधशालाओं पर नकेल कसी गई तो थोड़ा बहुत सुधार हो सका था. बाद में काली नदी को नमामि गंगे परियोजना में शामिल किया गया लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ काम अस्तित्व में नहीं आ सका। कृष्णकांत इस मामले को गंगा पुनरोद्धार मंत्री उमा भारती से लेकर नितिन गडकरी और वर्तमान में गजेंद्र सिंह शेखावत के समक्ष उठाते रहे हैं.
सांसद ने भी उठाया मुद्दा
मेरठ हापुड़ सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने भी काली नदी के मामले को कई बार लोकसभा में उठाया। लेकिन सरकारी उदासीनता के चलते कोई कार्रवाई नहीं हुई। आसपास के जन जीवन पर इसका प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
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अधिकारी हो चुके हैं तलब
कृष्णकांत सिंह हूण की याचिका पर काली नदी के प्रदूषण मामले में हापुड़ व मेरठ के जिला अधिकारी तथा नगर आयुक्त, अधिशासी अधिकारी एनजीटी में तलब किए जा चुके हैं। पूर्व मंडलायुक्त प्रभात कुमार से भी हिंडन की तरह काली नदी स्वच्छता कार्यक्रम को राजकीय अभियान बनाने की मांग की गई थी। लेकिन यह योजना भी परवान नहीं चढ़ सकी।
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