किसानों की दुर्दशा पर यूं तो पूरे साल राजनैतिक रोटियां सिकती रहीं। लेकिन मंदे की मार से त्रस्त किसान के उत्थान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। किसानों को फसलों से लागत निकाल पाना भी मुश्किल रहा।
गन्ने का भुगतान समय पर नहीं मिलने से बच्चों की स्कूल फीस भी नहीं भर सके। पूरे साल अन्नदाता खाली जेब सरकार को कोसता रहा। वहीं नोटबंदी से किसानों की कमर टूट गई है।
किसान को देश की रीढ़ कहा जाता है।
सरकार की गलत नीतियों से अन्नदाता आर्थिक संकट झेल रहा है। किसानों को न तो उपज का लाभकारी मूल्य मिल रहा है और न ही गन्ने का बकाया। नोटबंदी ने तो किसानों को बेहाल कर दिया।
फसल बुवाई के लिए बैंकों से पर्याप्त रुपया नहीं मिलने के कारण गेहूं की बुवाई प्रभावित हो रही है। वहीं, किसान अपने बच्चों की शादी और स्कूल की फीस भी नहीं भर पा रहे हैं। उधर, शासन प्रशासन की अनदेखी से गन्ना किसानों को बीते वर्ष का भी बकाया भुगतान नहीं मिल सका है।