आजादी के सात दशक बाद भी भूमि पुत्र सिस्टम के चक्रव्यूह में फंसकर कराह रहा है। हुक्मरान किसानों की मदद को लेकर कतई गंभीर नहीं है। जिले के करीब तीन हजार किसान दो साल बाद भी ओलावृष्टि में बर्बाद हुई फसल के मुआवजे के लिए चक्कर काट रहे हैं।
जबकि जिला प्रशासन मुआवजे के नौ करोड़ रुपये शासन को लौटा चुका है। सूबे में वर्ष 2015 में अतिवृष्टि व ओलावृष्टि से किसानों की फसल चौपट हो गई थी। प्रदेश सरकार ने 75 में से 52 जिलों को आपदा ग्रस्त घोषित भी किया था।
हापुड़ जिले मे भी कुल 13724 किसानों को मुआवजे के लिए चिन्हित किया गया। शासन की ओर से जिले को कई किस्तों में 10 करोड़ 49 लाख रुपये मुआवजे मिले भी थे। इसमें से किसानों को मात्र एक करोड़ दो लाख 99 हजार किसानों को ही मुआवजा दिया गया।
जबकि 9.04 करोड़ रुपया जिला प्रशासन ने शासन को सरेंडर कर दिया। यह स्थिति तब है जबकि जिले में अब भी 2940 किसान मुआवजे के लिए अधिकारियों और बैंकों के चक्कर लगा रहे हैं।
हापुड़ ब्लाक में ओलावृष्टि में सबसे अधिक प्रभावित गांव दयानगर, बनखंडा, मोहम्मदपुर आजमपुर, भडंग़पुर, रसूलपुर, बहलोलपुर, कन्हिया कल्याणपुर, कुचेसर चौपला व शाहपुर जट्ट रहे। इनमें 164 किसानों को मुआवजे के लिए चिन्हित किया गया। जिनमें से मात्र 87 को ही मुआवजा मिल सका।
बाकी अभी तक अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं। गांव दयानगर निवासी हरिराज सिंह ने बताया कि उसकी साढ़े पांच पक्का बीघा फसल बर्बाद हो गयी थी। लिस्ट में उसका नाम शामिल होने के बावजूद आज तक उसके खाते में मुआवजा धनराशि नहीं आयी।
बैंक व तहसील अधिकारियों के चक्कर लगाते लगाते वह परेशान हो चुका है। इसके अलावा कर्मवीर सिंह, हेमराज सिंह, राजवीर सिंह, संजय, धर्मपाल, बिजेंद्र, गजराज सहित सभी किसानों का यही हाल है।
किसानों का आरोप है कि उनको पहले आर्थिक मदद अकाउंट चेक से दी जाती थी। सरकार ने केंद्र के निर्देश पर राहत से जुड़ी रकम का भुगतान ई पेमेट के जरिए करने का निर्णय लिया। इसमें किसानों के खातों में राहत की रकम भेजनी थी।
बदली गयी व्यवस्था से निचले अधिकारियों की कमाई का धंधा बंद होने से उन्होंने इस मामले में रुचि नहीं दिखाई। जबकि जिला प्रशासन का कहना है कि बदले हुए नियमों के कारण कई किसानों को मुआवजा नहीं बंट सका।
डीएम अनिल ढींगरा ने बताया कि नियमों में बदलाव के कारण धनराशि को सरेंडर किया गया। पहले किसान को अधिकतम 18 हजार व न्यूनतम 15 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मुआवजा मिलना था।
बाद में शासन ने इसे बदलकर अधिकतम दो हजार रुपये व न्यूनतम एक हजार रुपये प्रति हेक्टेयर कर दिया। नियम बदलने के बाद पहले जारी मुआवजे की धनराशि बच गई। जिसे सेरेंडर किया गया। इसके अलावा जो किसान मुआवजे से वंचित रह गए हैं, उनके अकाउंट नंबर या आईएफएससी कोड गलत रहे होंगे।