मौसम अनुकूल रहने के कारण इस बार आलू की बंपर पैदावार हुई है। बावजूद इसके मंदी की मार ने किसानों की कमर तोड़ दी है। आगे रेट बढ़ने की आस में किसान आलू को शीतगृहों में रखने का प्रयास कर रहे हैं
लेकिन वहां इतनी लंबी कतारें है कि कई-कई दिन में ट्राली खाली करने का नंबर आ रहा है। समाप्त हो रहे वित्तीय वर्ष में बंद गोभी, टमाटर, मटर और धान की फसल में भी किसानों को मंदी के कारण लागत तक ठीक से हाथ नहीं आई है। इन हालात में खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है।
हापुड़ के आसपास का इलाका पहले ही आलू की खेती का केंद्र रहा है। इसी का परिणाम है कि यहां एक दर्जन से अधिक शीतगृह हैं। किसान खुदाई के बाद आमतौर पर इन शीतगृहों में ही आलू का भंडारण करते हैं, लेकिन पिछले कई सालों से आलू की कीमत ठीक नहीं मिल पा रही है,
जिससे किसान बर्बादी के कगार पर हैं। बावजूद इसके इस सीजन में हापुड़ और इसके आसपास के इलाकों में करीब 6000 हेक्टेयर आलू की बुवाई की गई। इससे अनुमान है कि 25 लाख से अधिक कट्टा आलू पैदा हुआ है।
नतीजतन, अब जो किसान आलू बेचना चाहते हैं, उन्हें रेट काफी कम मिल रहा है। आलू का पिछला सीजन भी बुरी तरह से पिटा था। किसानों को शीतगृहों का किराया भी अपने पास से देना पड़ा था। बहुत से किसान तो शीतगृहों में ही आलू छोड़ गए थे।
इस समय 3797 आलू का रेट 200 से 250 रुपये कट्टा है, जबकि ख्याति और खुफरी बादशाह आलू का रेट 150 रुपये कट्टा है। एक कट्टा में 52 किलो आलू भरा जाता है। एक बीघा जमीन में औसतन 35 कट्टा आलू निकल रहा है।
इससे साफ है कि एक बीघा में औसतन 6 हजार रुपये का आलू निकल रहा है। जबकि एक बीघा आलू पर खाद, बीज, जुताई, कीटनाशकों का छिड़काव, सिंचाई, खुदाई, छंटाई, और ढुलाई आदि की लागत लगभग पांच हजार रुपये प्रति बीघा आती है।
ऐसे में अगर किसी ने जमीन ठेके पर लेकर आलू बोया होगा तो उसे एक पैसा भी नहीं बचेगा। आलू भंडारण का किराया इस सीजन में शुगर फ्री 250 रुपये प्रति क्विंटल और सादा आलू 220 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है।
किसान इसे काफी महंगा बता रहे हैं। इससे पहले इसी वित्तीय वर्ष में धान, मटर, टमाटर और बंद गोभी में भी मंदी की मार ने किसानों को बर्बाद कर दिया है।
नवादा गांव के अरुण चौधरी ने कहा कि उनके गांव सहित आसपास के तमाम गांवों में हजारों हेक्टेयर में बंदगोभी की खेती होती है। इसका बीज 30 हजार रुपये किलो तक मिलता है,
लेकिन इस सीजन में बंदगोभी दिल्ली भेजने वालों को मंदे के कारण कई बार किराया भी अपने पास से देना पड़ा हैै। ऐसे में अनेक किसानों ने फसल समेत खेत जुतवा दिए। कुल मिलाकर बंद गोभी के किसानों को करोड़ों का नुकसान हुआ है।