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आलू की खेती में झुलसा रोग के पांव पसारने से किसानों में बेचैनी

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आलू की खेती में लगा झुलसा रोग, किसानों की बढ़ी बेचैनी

गढ़मुक्तेश्वर। आलू की खेती में झुलसा रोग लगने से किसानों की बेचैनी बढ़ने लगी है। क्योंकि पौधों का विकास प्रभावित होने से आगे चलकर उत्पादन भी घटता है।
पर्ची किल्लत के चलते गेहूं और सरसों जैसी फसलों की बुआई के लिए खेत खाली करने में किसानों के पसीने छूट रहे हैं, जिन्हें कोल्हू-क्रेशरों पर बेहद सस्ते दाम में गन्ना बेचना पड़ रहा है। आलू की खेती से किसानों को अपनी आर्थिक हालत में थोड़ा सुधार होने की आस थी, लेकिन झुलसा रोग के पांव पसारने से वह भी परवान चढती दुश्वार नजर आ रही है।
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दो तरह का झुलसा रोग करता है नुकसान
मुरादनगर कृषि अनुसंधान केंद्र के फसल सुुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. अरविंद यादव का कहना है कि आलू की खेती में दो तरह का झुलसा रोग नुकसान करता है, जिसमें एक प्रारंभिक अवस्था और दूसरा फसल तैयार होने के दौरान नुकसान करता है। उन्होंने बताया कि अगेती झुलसे को अंगकारी रोग भी कहा जाता है। यह रोग आल्टनीरियम कवक नामक फफूंदी से फैलता है और पछेता झुलसा फाइटो पथोरा नामक फफूंदी से होता है, जो बेहद विनाशकारी साबित होता है। क्योंकि महज पांच दिनों के भीतर हरी पत्तियों को बर्बाद कर पौधे से नीचे गिरा देता है। सबसे पहले पत्तियों पर तिकोने गोल अंडाकार धब्बे पड़ते हैं, जो धीरे धीरे बढ़ने पर काले रंग में बदल जाते हैं। जिससे पत्ती सिकुड़ने पर पौधों का विकास रुकने से पैदावार घट जाती है।
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रोग राधि प्रजाति वाला बीज बोएं
कृषि प्राविधिक सहायक सतीश चंद्र शर्मा का कहना है कि झुलसा रोग की रोकथाम को दो ग्राम मेकोनजेब कीटनाशक को एक लीटर पानी में मिलाकर पौधों पर छिड़काव करें। इसके अलावा रोग रोधी प्रजाति वाला बीज ही बोएं और फसल चक्र का विशेष ख्याल रखें।
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