फोटो 17 एचएएमपी 10- धनतेरस पर तैयार मौदहा की चांदी की मछलियां साथ में दुकानदार। संवाद
हमीरपुर। बुंदेलखंड की मिट्टी से पनपी 400 साल पुरानी कला मौदहा की मशहूर चांदी की मछली इस धनतेरस पर भी अपनी अनोखी चमक बिखेरने के लिए तैयार है। चांदी की बारीक तारों और महीन जालियों से बनाई जाने वाली यह मछली न सिर्फ त्योहारों की रौनक बढ़ाती है, बल्कि बुंदेलखंड की कारीगरी की विरासत को देश-विदेश में पहचान दे रही है।
मौदहा कस्बे के सोनी परिवार की सात पीढ़ी इस हस्तकला को जीवित रखे हुए हैं। राजेंद्र सोनी बताते हैं कि इस बार धनतेरस के लिए लगभग 10 किलोग्राम चांदी से मछलियां तैयार की गई हैं। पिछले साल की अपेक्षा इस वर्ष भी काफी बिक्री की उम्मीद है। त्योहारों की रौनक और शुभ मान्यता के चलते लोगों में उत्साह अब भी बरकरार है। परिवार ने त्योहार से पहले सभी मछलियां तैयार कर ली हैं। राजेंद्र कहते हैं, हम नवरात्र से ही मछली बनाने में जुटे हैं। परिवार के सभी सदस्य दिन-रात मेहनत कर रहे हैं ताकि धनतेरस पर खरीदारों को भरपूर विकल्प मिलें।
त्योहार से कारीगरों को सहारा
सोनी परिवार के लिए दीपावली और धनतेरस हमेशा उम्मीद और उत्साह लेकर आते हैं। राजेंद्र बताते हैं, सालभर जितनी बिक्री नहीं होती, उतनी धनतेरस पर होती है। यही त्योहार हमें हमारी परंपरा और जीविका दोनों को बनाए रखने का उत्साह देता है। स्थानीय सर्राफ़ और व्यापारी अब भी मछली को स्टॉक करते हैं। चांदी की कीमत बढ़ गई है, लेकिन त्योहार के अवसर पर यह कला अब भी लोगों तक पहुंच रही है। उस कलात्मक मछली के लोग कायल हैं। लेकिन सरकारी मदद नहीं है।
चंदेल शासनकाल से जुड़ी है विरासत
मौदहा की चांदी की मछली की जड़ें चंदेल शासनकाल से जुड़ी हैं। 1738 में नवल सोनी के पुत्र मोहनलाल और तुलसीदास सोनी ने इसे मूर्त रूप दिया। ब्रिटिश काल में यह मछली लंदन प्रदर्शनी में पहुंची, जहां महारानी विक्टोरिया ने इसे असली समझ लिया और तुलसीदास सोनी को 1807 का मेडल और सिक्का भेंट किया। 1981 में उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इस परिवार को सम्मानित किया। धार्मिक मान्यता है कि दीपावली और धनतेरस पर घर में चांदी की मछली रखने से सुख-समृद्धि आती है।
फोटो 17 एचएएमपी 10- धनतेरस पर तैयार मौदहा की चांदी की मछलियां साथ में दुकानदार। संवाद