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ऐतिहासिक तीजा मेला आपसी प्रेम-सद्भाव का प्रतीक

Wed, 23 Aug 2017 11:17 PM IST
अमर उजाला/हमीरपुर
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कस्बे का ऐतिहासिक तीजा मेला आपसी प्रेम, सौहार्द एवं सद्भाव का प्रतीक है। साथ ही बुंदेलखंड की लोक संस्कृति व कला का भी परिचायक है। यह जनपद का सबसे बड़ा मेला है।
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इसमें लाखों की संख्या में लोग इसे देखने के लिए पहुंचते हैं। मेले में शिल्प कला, नाट्य कला, मूर्ति कला, चित्रकला सहित लोक संगीत कला के उत्कृष्ट नमूने देखने को मिलते हैं।


कस्बे का ऐतिहासिक तीजा मेला एवं जल बिहार भगवान श्रीकृष्ण लीला का महोत्सव है। जो नगर वासियों के शैक्षिक, शारीरिक व आर्थिक सहयोग से संपन्न होता है। इस मौके पर बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का प्रदर्शन होता है। ग्रामीण क्षेत्रों से लाखों की संख्या में जन समुदाय इसे देखने के लिए एकत्र होते हैं और हरतालिका तीज के अवसर पर कस्बे की छटा विशेष दर्शनीय हो जाती है। रात के सांस्कृ तिक कार्यक्रम, आल्हा गायन, दंगल, कबीरी भजन, भगवान श्रीकृष्ण सहित दो दर्जन से अधिक मनमोहक झांकियां, हरचंदन तालाब में नागनाथन लीला व कंस वध आदि मेले के आकर्षण का केंद्र है। तीजा मेला के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह महोत्सव करीब डेढ़ वर्षों से होता चला आ रहा है।
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इसकी शुरुआत परसादी प्रसाद द्विवेदी, रघुनाथ प्रसाद मिश्र, जगन्नाथ मिश्र, लाऊ सिंह भदौरिया, हनुमंत सिंह कछवाह, मुक्ता प्रसाद व लल्ली सेठ के सहयोग से बाबूराम ओमर ने की थी। दिवंगत साहित्यकार, पत्रकार व कवि बाबू भास्कर निगम की पुस्तक के अनुसार प्रारंभ में चार-पांच छोटी झांकियां निकलती थी। बाबूराम ओमर के निधन के बाद रामेश्वर गुप्त ने इसकी बागडोर संभाली। पं.भिखारी प्रसाद मिश्रा, रमाकांत शुक्ल, सूरा पंडा, मुंशी राजाराम तथा दया प्रसाद मिश्रा सहयोगी रहे। इसके बाद डा.रामकुमार द्विवेदी ने इस पर्व को आगे बढ़ाते हुए और भव्य बनाया।

1970 के दशक से देवनारायन द्विवेदी, नवल किशोर मिश्र, बृजलाल सिंह, चंद्रशेखर पांडेय, शरदचंद्र मिश्रा, रामशरण मिश्र, दयाशंकर पांडेय, रजनीकांत द्विवेदी व देवनारायन मिश्रा आदि की कमेटी ने इस तीजा मेला को संभाला। वर्तमान में अतुल कुमार दुबे, कुंजबिहारी  पांडेय सहित युवा हाथों में इसकी बागडोर आ गई है।

समिति के सचिव नवल किशोर मिश्र ने बताया कि अब शोभायात्रा में तीन दर्जन से अधिक झांकियां निकाली जाती हैं। जो चांदथोक स्थित श्रीकृष्ण मंदिर से प्रारंभ होकर हरचंदन तालाब में नागनाथन लीला व कंस वध के साथ संपन्न होती है। वहीं दूसरे दिन दंगल व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। करीब 150 वर्षों से चल रहे तीजा महोत्सव के इतिहास में वर्ष 1984 में स्वामी नागाजी रोटीराम महाराज की जघन्य हत्या होने के कारण यह महा उत्सव स्थगित कर दिया गया था।

बाढ़ में भी निकल चुकी है शोभायात्रा
वर्ष 1978 में चंादथोक का क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित हो गया था। इसके बावजूद तीजा मेला कमेटी ने शोभायात्रा निकाली थी। श्रीकृष्ण मंदिर से सड़क तक झांकियां पहुंचाने के लिए बड़ी समस्या थी और कमेटी के लोग परेशान थे। तब देवनारायन द्विवेदी उर्फ टुम्मी भइया ने अपने ट्रैक्टर से एक-एक झांकी को खींचकर सड़क तक पहुंचाया था। तब शोभायात्रा संपन्न हुई थी। तभी से तीजा कमेटी का अध्यक्ष टुम्मी भइया को बना दिया गया।

प्रशासन का नहीं मिलता सहयोग
जनपद का ऐतिहासिक तीजा मेला होने के बावजूद अभी भी शासन प्रशासन से इसे कोई आर्थिक सहयोग नहीं मिलता है। सेवानिवृत्त प्राचार्य व साहित्यकार डा.भवानीदीन का कहना है कि महोबा का कजरी मेला, चरखारी का बिहारीजू का मेला सरकार के हाथों से संचालित हैं। लेकिन सुमेरपुर का मशहूर तीजा मेला आज भी प्रशासन से अलग-थलग पड़ा हुआ है। इसके लिए भी प्रयास होने चाहिए। मनोनीत सभासद राजेंद्र निगम व अवधेश प्रजापति ने मेले को रजिस्टर्ड कराए जाने की बात कही है।
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