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दिवारी और मयूर नृत्य की रही धूम

Tue, 01 Nov 2016 11:34 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, हमीरपुर
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राठ में मैकासुर मंदिर में मयूर नृत्य करते कलाकार। - फोटो : amarujala
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दिवाली पर दिवारी व मयूर नृत्य की हर तरफ धूम रही। द्वापर युग की दिवारी नृत्यकला बुंदेलखंड में आज भी लोकप्रिय है। इधर, भैयादूज पर बहनों ने भाइयों का तिलक कर दीर्घायु की कामना की। इसके साथ ही गोवर्धन पूजा व मौन व्रत की परंपरा भी निभाई गई।
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जिले में प्रकाश पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया गया। दिवाली के  अगले दिन परेवा पर गोवर्धन पूजा भी जगह-जगह पर विधि-विधान से की गई। मौनियों ने मौन व्रत धारण कर मोर पंखों के साथ श्रीकृष्ण की उपासना की और मौन चराने की परंपरा को निभाया। भैयादूज के अवसर पर बहनों ने भाइयों के मस्तक पर रोली चंदन और हल्दी लगाकर उनके दीर्घायु होने की कामना की। राठ प्रतिनिधि के अनुसार, कस्बे के पड़ाव स्थित मैकासुर देव स्थान पर सैकड़ों की तादाद में मौनियों ने पहुंच पूजा अर्चना कर माथा टेक नारियल फोडे़। पड़ाव चौराहे और मैकासुर देव स्थान पर कस्बे की अतरौलिया, लुधियातपुरा और सिकंदरपुरा की दिवारी नृत्य में मृदंग की थाप पर थिरकते हुए प्रदर्शन किया। कार्तिक स्नान करने वाली महिलाओं ने भी नदियों और पोखरों में स्नान कर पर्व का परायण किया।

पौथिया प्रतिनिधि के अनुसार, बैठका स्थान पर पौथिया, कीरतपुर, सहजना, कलौलीतीर गांव के मौनिया एकत्र हुए। मौनियों को परात में पानी पिलाया गया। ग्रामीणों में जमकर दिवारी नृत्य हुआ, एक दूसरे के गले मिलकर त्योहार की बधाई दी। इस मौके पर कीरतपुर प्रधान बलसिंह यादव, कलौलीतीर प्रधान विनोद सचान, रामपाल, अशोक सचान, पौथिया के रामलखन पौथिया सहित सैकड़ों ग्रामीण रहे।
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मौदहा प्रतिनिधि के अनुसार, त्योहार पर किसानों ने अपनी खेतीबाड़ी के साथ गौवंश पर विशेष ध्यान दिया। परेवा के दिन मवेशियों को नहला-धुलाकर सजाया गया। गले में मोर के पंख से बनी मालाएं डाल उनके खाने का विशेष प्रबंध किया गया।

वर्षों पुरानी है दिवारी नृत्य कला
दिवाली की मुख्य पहचान जगह-जगह लगने वाले मेलाें की शान तथा शारीरिक सौष्ठव की पहचान, द्वापर युग की दिवारी नृत्यकला बुंदेलखंड में आज भी जीवंत है। दिवारी नृत्य के प्रति बाल कलाकाराें का रुझान देखकर तो ऐसा लगता है कि यह कला आगे भी निरंतर चलती रहेगी। गौरतलब हो कि दिवाली पर्व का ताल्लुक त्रेता युग से है।

जबकि मौन व्रत पूजा, गोबर्धन पूजा का संबंध द्वापर युग से है। दिवारी नृत्य का संबंध भी द्वापर युग से जुड़ा हुआ है। बुंदेलखंड में प्रकाश पर्व आने के 15 दिन पहले से दिवारी नृत्य पर अभ्यास शुरू हो जाता है। जो प्रकाश पर्व के बाद महीनों तक चलता रहता है। दिवारी नृत्य के बुजुर्ग कलाकार इस विधा को बाल कलाकारों को सिखाकर बुंदेलखंड में लंबे समय तक कायम रखने के लिए जुटे हुए हैं। दिवारी नृत्य के कलाकारों का कहना है कि इस कला से शारीरिक सौष्ठव के साथ किसी भी शत्रु का सामना करने का आत्मबल बना रहता है।

संगठन में शक्ति का भाव पैदा होता है। इसके साथ ही द्वापर युग के योगी श्रीकृष्ण की उपासना, गायन व वादन के साथ नाचते गाते मस्ती से झूमते हुए आनंद प्राप्त होता है। कलाकार बताते हैं कि दीवारी नृत्य बुंदेलखंड की शान है। बिना इसके त्योहार की परंपराएं संपन्न नहीं होती हैं।
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