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पूरे महीने होती है अल्लाह की इबादत, गरीबों को मदद करने पर भी मिलता शबाब

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सुमेरपुर में इफ्तार के समय दुआ मांगते रोजदार। - फोटो : HAMIRPUR
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भरुआसुमेरपुर। जिस तरह तलवार के वार को ढाल रोकती है। उसी तरह माहे रमजान का रोजा भी रोजेदार का बचाव करता है। इस महीने में दिनरात अल्लाह की इबादत होती है। लिहाजा इसे शहरे रमजान यानी अल्लाह का महीना कहा जाता है।
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ईदगाह मदरसा के हाफिज रियातुल्ला ने बताया जैसे मस्जिद ए काबा को अल्लाह का घर कहते हैं। क्योंकि वहां अल्लाह के ही काम होते हैं। ऐसे ही रमजान अल्लाह का महीना है। क्योंकि इस महीने में अल्लाह के ही काम होते हैं। रोजा तरावीह वगैरा तो है ही अल्लाह के काम। मगर बहालते रोजा जो जायज नौकरी और जायज तिजारत वगैरा की जाती है वह भी अल्लाह के काम करार पाते हैं। इसलिए इस माह का नाम रमजान यानी अल्लाह का महीना है।
उन्होंने बताया माहे रमजान खरीफ की बारिश की तरह है। जैसे बारिश से जमीन धुल जाती है और रबी की फसल अच्छी होती है। उसी तरह यह महीना भी रोजेदारों के दिल के गुबार धो देता है और इससे अमाल की खेती हरी भरी रहती है। इसलिए इसे रमजान कहते हैं।
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उन्होंने बताया एक हदीस में रिवायत है कि कयामत में जब दोजख गुनाहगार पर हमलावर होगी तो हुक्म होगा कि जो रोजेदार मरे हैं वह कहां है। जब वह सामने जाएंगे तो दोजख उनकी बू पहचान कर चालीस बरस के फासले पर उनसे दूर हट जाएगी।
यानि दोजख रोजेदार को छू भी नहीं पाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि माहे रमजान में गरीबों को मदद करने पर भी ज्यादा से ज्यादा शबाब मिलता है। अपने माल की जकात व खरौत निकालकर गरीबों में बांटे।
घरों में इबादत करने को मशगूल रोजेदार
भरुआसुमेरपुर। लॉकडाउन के चलते माहे रमजान में रोजेदार घरों में ही इबादत करने मशगूल हैं। इफ्तार व नमाज के समय भी यह लोग सामाजिक दूरी बनाकर खुदा की इबादत कर रहे हैं।
ईदगाह मोहल्ले में इदरीश अहमद का पूरा परिवार रोजा रखे है। यह लोग सुबह सहरी करने के बाद पूरे दिन भीषण गर्मी व तपिश के बाद भी माहे रमजान के हर नियम का पालन कर रहे हैं। उनके पुत्र रसीद अहमद ने बताया तरावीह व नमाज के दौरान सामाजिक दूरी का पालन किया जा रहा है। बताया हर इबादत के बाद माहे मुबारक रमजान के सदकेतुफैल में वैश्विक महामारी कोरोना को खत्म करने की दुआ की जा रही है। कहा अल्लाह हमें जरूर इस महामारी से निजात दिलाएगा।

हाफिज रियातुल्ला साहब- फोटो : HAMIRPUR

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