बेमौसम हुई अतिवृष्टि व ओलावृष्टि से आई आपदा का असर ग्रामीण क्षेत्रों में
दिखने लगा है। शनिवार को सतुवाही अमावस्या पर पुरानी परंपरा निभाने में
किसान असमर्थ रहे। चने की फसल न होने से चना भूनने वाले भारों में आग नहीं
डाली गई। लोग सतुवाही अमावस्या पर सत्तू की साेंधी मिठास चखने को तरस गए ।
वहीं बाजार में सत्तू 160 रुपये किलो बिका।
प्रतिवर्ष वैशाख मास की अमावस्या पर सतुवाही अमावस्या का त्योहार मनाया
जाता है। जिसमें चने के सत्तू खाने की पुरानी परंपरा है। वहीं बीते दिनाें
हुई बारिश का असर इस छोटे से त्योहार में भी दिखाई दिया। खेताें में खड़ी
फसलें बर्बाद हो चुकीं हैं। हजारों बीघे में बोई गई चने की फसल में फलियां
ही नहीं आईं।
जिससे किसानों के पास चने का अकाल पड़ गया है और सत्तू
किसानाें से कोसाें दूर हो गया। इस कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कई घरों में
सतुवाही अमावस्या नहीं मनाई जा सकी। वहीं कुछ लोगों ने बाजार में बिक रहे
160 रुपये किलो मंहगे सत्तू को खरीदकर महज त्योहार की रस्म अदायगी की। वहीं
चना भूनने वाले भार भी खाली पड़े रहे।
उजनेड़ी गांव निवासी बउवा महाराज सत्तू तैयार करने के तरीके
बताते हुए उसके स्वाद की तारीफ करते नहीं अघाते। कहते हैं कि फसल आने पर
सतुवाही अमावस्या में तैयारियां घर में 3-4 दिन पहले से शुरू हो जाती थीं।
घर की महिलाएं चने के दानों की सफाई कर रात भर पानी में भिगोकर रखती थीं।
सुबह हल्का सुखाने के बाद भूनने को भेजा जाता था। भुंजने के बाद छिलके की
सफाई के बाद महिलाएं घर में हाथ चकिया से पीसती थीं तब सत्तू तैयार होता
था। फिर उसे भगवान को चढ़ाने के बाद खाया जाता था। लेकिन इस वर्ष तो चना
हीं नहीं है। सत्तू तो दूर की बात है।
तीज
त्योहारों पर घर-घर मांगकर अपना भरण-पोषण करने वाली गांव की ही सूरी कहती
है कि हर बरस गांव के बड़े घरन ते सतुवाही मा खूब सतुवा मिलत तो, लेकिन या
साल अइसी भाभई परी की कहू चीख्यो का सतुवा नहीं मिलो।
गांव
के बुजुर्ग शिवचरन सिंह पुरानी परंपरा को निभाते दिखे। वह कहते हैं कि
पिछले साल के रखे चने से सत्तू बनवाया है। त्योहार पर पहले ब्राह्मणाें को
खिलाते हैं फिर वह और परिवार के लोग खाते हैं।
पुरानी बात पर कहते हैं मनन
सतुवा भुजवाओ जात तो। कहते हैं नाते रिश्तेदार से लेकर मजदूर तक सभी सत्तू
का कलेवा करत ते। इस वर्ष तो भगवान ने सब नष्ट कर दिया।