कस्बे की तपोभूमि स्थित यज्ञवेदी में सरस्वती संस्कृत
विद्यालय के तत्वावधान में ब्राह्मण बटुकों का सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार
कराया गया। इस मौके पर 27 बटुकों को वेदमंत्रों के साथ जनेऊ धारण कराया
गया। इसके बाद प्रसाद वितरण और भंडारे का आयोजन किया गया।
तपोभूमि
में बटुकाें का यज्ञोपवीत संस्कार आयोजित किया गया। आचार्य माधव नारायण
शास्त्री तथा आयोजक संस्कृत विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य पं. बल्देव
प्रसाद शास्त्री के मार्गदर्शन में मयंक तिवारी, आशीष त्रिपाठी, अंकुर
अवस्थी, सौरभ मिश्रा, अमित द्विवेदी, अभिषेक दीक्षित, कपिल पाठक, पवन
द्विवेदी, संतोष, दुर्गेश, अनिल, प्रेम द्विवेदी सहित 27 ब्राह्मण बटुकों
का उपनयन संस्कार विधि-विधान से संपन्न कराया।
आचार्यो ने
यज्ञोपवीत का महत्व समझाया। बटुक ब्राह्मणों ने यज्ञ में आहुति देने के बाद
माताओं से भिक्षा लेने की परंपरा निभाई। जब सभी बटुक शिक्षा ग्रहण करने
काशी जाने लगे तो समाजसेवी डॉ. आलोक पालीवाल ने उनको मनाया और कस्बे के ही
संस्कृत विद्यालय में विद्या ग्रहण करने का अनुरोध किया। इस पर बटुक मान
गए।
उन्होंने सभी बटुकों को विदाई भी दी। कौशल किशोर शुक्ला,
आदित्य अवस्थी, शमशेर बहादुर सिंह, लक्ष्मी प्रसाद मिश्रा, भागवत तिवारी,
उमादत्त शुक्ला, अशोक शास्त्री, राजेश कुमार शास्त्री आदि ने कार्यक्रम को
सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।
यज्ञोपवीत भारतीय संस्कृति और
प्राचीन परंपरा में शामिल है। ऋषि मुनियों ने जनेऊ धारण करने के बाद ही
विविध धार्मिक व मांगलिक अनुष्ठान कराना उचित बताया है। आचार्य बल्देव
प्रसाद शास्त्री का कहना है कि जनेऊ धारण करने से तन और मन पवित्र रहता है।
गायत्री मंत्र द्वारा निर्मित तथा ब्रह्म गांठ युक्त यज्ञोपवीत
धारण करने तथा नियम संयम का पालन करने से शरीर सुरक्षित तो रहता ही है, साथ
ही निरोगी रहता है। जनेऊ को कान में धारण करने का भी वैज्ञानिक कारण है।
यज्ञोपवीत सिर्फ धागा ही नहीं, हमारी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तन
मन को शुद्ध, सुंदर और निरोगी रखने का आधार है।