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एड्स पीड़ित महिलाएं भी दे सकती हैं स्वस्थ शिशु को जन्म

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एड्स पीड़ित महिलाएं भी दे सकती हैं स्वस्थ शिशु को जन्म
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गोरखपुर। एड्स जैसी लाइलाज बीमारी से ग्रस्त महिलाएं भी स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती हैं। जिले में इस वर्ष एड्स पीड़ित करीब 40 महिलाआें ने गर्भ धारण किया। इनमें से 26 को सुरक्षित प्रसव हुआ। जांच में 20 शिशु ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) मुक्त पाए गए।
छह शिशुओं की एचआईवी जांच उनके छह सप्ताह के होेने पर की जाएगी। यह संभव हुआ बीआरडी मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग स्थित प्रिवेंशन ऑफ पैरेंट्स टू चाइल्ड ट्रांसमिशन (पीपीटीसीटी) सेंटर में एड्स पीड़ित महिलाओं की गर्भधारण करने से लेकर प्रसव होने तक पूर्ण देखभाल की वजह से। सेंटर की काउंसलर कविता तिवारी ने इन महिलाओं को स्वस्थ शिशु को जन्म देने में सलाह से लेकर देखभाल तक में मदद की।
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कविता तिवारी के मुताबिक एड्स पीड़ित महिलाओं के गर्भवती होने पर विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। शिशु के एचआईवी ग्रस्त होने की संभावनाएं वैसे तो गर्भ धारण करने की प्रथम तिमाही से ही रहती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा खतरा जन्म से 72 घंटे के भीतर होता है। जो महिलाएं एड्स पीड़ित होती हैं उनको एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी (एआरटी) की दवा चलती है। ऐसी महिलाओं के बच्चों में एचआईवी संक्रमण की संभावनाएं सबसे कम होती हैं क्योंकि यह गर्भधारण के पहले से ही एआरटी चल रही होती है। कई महिलाएं ऐसी होती हैं जिनके एड्स पीड़ित होने की जानकारी उनके गर्भवती होने के बाद मिलती है। ऐसी महिलाओं की एआरटी दवाएं जितनी देर से शुरू होती हैं, उनके बच्चे के संक्रमित होने की संभावनाएं अधिक होती हैं।
72 घंटे के भीतर दी जाती है सिरप की डोज
बच्चों को एचआईवी संक्रमण से बचाने के लिए जन्म के 72 घंटे के भीतर नेविरेपिन सिरप की एक डोज दी जाती है। छह सप्ताह पर बच्चे की एचआईवी संक्रमण की प्राथमिक जांच की जाती है। छह सप्ताह से 18 माह की उम्र तक सेप्ट्रॉन नामक दवा दी जाती है। 18 माह का होने पर शिशु की एक और जांच की जाती है। एड्स पीड़ित 20 महिलाओं के बच्चे प्राथमिक जांच यानी छह सप्ताह बाद वाली जांच में एचआईवी निगेटिव पाए गए। छह बच्चों की जांच उनके छह सप्ताह का होने के बाद की जाएगी।
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जिले में 51 एड्स पीड़ित मरीज टीबी रोगी
जिला अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में जिले में कुल 3717 एड्स पीड़ित हैं। इनमें से 51 मरीज क्षय रोग का भी शिकार हैं। एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम (एड्स) से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता समाप्त होने लगती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता घटने से शरीर छोटी सी बीमारी से भी लड़ने की क्षमता खो देता है। एड्स रोगी को यदि क्षय रोग हो जाता है तो उसका इलाज काफी मुश्किल होता है। जिला एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के नोडल अधिकारी के अनुसार एड्स के रोगियों की पहचान के साथ ही लोगों को इस बीमारी से बचने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
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