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वाटर पार्क पर लगेगा ताला, अपने कब्जे में लेगा जीडीए

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वाटर पार्क
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वाटर पार्क पर लगेगा ताला, अपने कब्जे में लेगा जीडीए
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गोरखपुर। शहर के 14 साल पुराने वाटर पार्क नीर निकुंज पर जल्द ताला लग जाएगा। 12 एकड़ में फैले जिस चंपा देवी पार्क में वाटर पार्क संचालित होता है, गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) ने उसके साझेदारों का अनुबंध निरस्त कर दिया। इस संबंध में जीडीए उपाध्यक्ष ए. दिनेश कुमार की तरफ से 8 नवंबर को निर्देश भी जारी कर दिए गए और उसकी कॉपी साझेदारों को भेेज दी गई।
गोरखपुर विकास प्राधिकरण और मेसर्स केआर एम्यूजमेंट एंड रिसोर्ट्स के बीच 28 अक्तूबर 2005 को करार हुआ था। इस करार से संबंधित पूरक करार 19 अक्तूबर, 2007 को हुआ। जीडीए उपाध्यक्ष ने दोनों करार को निरस्त कर दिया। अफसरों के मुताबिक चंपा देवी पार्क को लेकर अनुबंध की शर्तों का साझेदारों ने उल्लंघन किया है। पार्क जीडीए की संपत्ति है। इसका संचालन करने वालों का अस्तित्व सिर्फ कस्टोडियन के रूप में है।
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करार का मकसद पार्क का समुचित रखरखाव, वाटर पार्क एवं इन्वायरमेंटल पार्क को विकसित करना था। मगर अनुबंध की शर्तें तोड़कर वहां पांच विवाह घर संचालित किए जा रहे थे। अनुबंध में पार्क का एक एकड़ हिस्सा सार्वजनिक उपयोग के लिए छोड़ने को कहा गया था। वहां पाथ-वे बनाना था। मगर उस हिस्से पर भी बाउंड्रीवाल निर्माण करा लिया गया। सभी गेटों पर सिक्योरिटी गार्ड बैठा दिए गए, जिससे आम आदमी पार्क के भीतर पहुंच ही नहीं पाता।
पार्क खाली कराने के लिए जीडीए ने पुलिस बल मांगा
जीडीए उपाध्यक्ष ने डीएम के. विजयेंद्र पांडियन को पत्र लिखकर मजिस्ट्रेट नामित करने का अनुरोध किया है ताकि चंपा देवी पार्क में वाटर पार्क, विवाह घर समेत जितने भी निर्माण या सामग्री है, उसकी सूची तैयार की जा सके। इसी तरह उपाध्यक्ष ने एसएसपी डॉ सुनील गुप्ता को पत्र लिखकर पार्क खाली कराने और वहां कब्जा प्राप्त करने के लिए पर्याप्त पुलिस बल की मांग की है। प्राधिकरण को अंदेशा है कि पार्क खाली कराए जाने के दौरान शांति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
साझेदारों को कोर्ट से भी नहीं मिली थी राहत
प्राधिकरण ने नीर निकुंज वाटर पार्क में अवैध तरीके से विवाह घर संचालित करने के आरोप में उसे सील कर दिया था। साझेदारों द्वारा सील तोड़ने पर प्राधिकरण ने इसी साल मार्च में उनपर मुकदमा भी दर्ज करा दिया था। वहीं सीलबंदी की कार्रवाई के खिलाफ साझेदारों ने कमिश्नर कोर्ट में अपील दाखिल की थी मगर वह खारिज हो गई। इस आदेश के खिलाफ वाटर पार्क के साझेदार हाई कोर्ट भी गए थे लेकिन उन्हेें वहां से भी राहत नहीं मिली।
साझेदारों ने अनुबंध की कई शर्तों को तोड़ा था। वहां विवाह घर संचालित किए जा रहे थे। पब्लिक के लिए पार्क था। मगर पैसे दिए बिना कोई पार्क के भीतर नहीं जा सकता था। अब उसे पूरी तरह से सार्वजनिक किया जाएगा ताकि आम आदमी वहां घूम-टहल सके। पार्क पर कब्जा लेने के बाद यह तय होगा कि वहां भविष्य में क्या-क्या गतिविधियां हो सकती हैं।
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- ए. दिनेश कुमार, उपाध्यक्ष, जीडीए
साझेदार दीपक अग्रवाल बोले
जीडीए भारत के कानून को नहीं मानता है। बिना नोटिस दिए ही वाटर पार्क का अनुबंध निरस्त कर दिया गया। वास्तव मेें 12 नवंबर को अनुबंध निरस्त करने का आदेश पारित किया और इसी तारीख में सभी साझेदारों को रिसीव कराया। यह आदेश भी बैक डेट (8 नवंबर) में जारी हुआ, जो कानूनन गलत है। जीडीए प्रशासन ने पहले 8 नवंबर को अनुबंध निरस्त करने का आदेश जारी किया था। इसकी प्रति व्हाट्सएप से मीडिया को भेजी गई थी। इस आदेश में सामान और स्ट्रक्चर हटाने के लिए दो महीने का समय दिया गया था, जबकि बैक डेट में जारी दूसरे आदेश में कोई समय नहीं दिया गया। इस तथ्य से कमिश्नर को अवगत कराया गया था। उन्हें बताया गया था कि आदेश रोकने के एवज में 10 लाख रुपये की मांग की जा रही है। इससे नाराज होकर ही जीडीए अफसरों ने नियम-कानून दरकिनार करके अनुबंध निरस्त कर दिया। वाटर पार्क मामले की सुनवाई कमिश्नर कोर्ट में चल रही है, इसकी भी अनदेखी की गई।
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