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विश्वनाथ के संरक्षक हैं मुसलमान

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मोहल्‍ले की इशरत जहां सहित अन्य महिलाएं बुजुर्ग विश्‍वनाथ को देती हैं खाना पानी।
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सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल
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विश्वनाथ के संरक्षक हैं मुसलमान
गोरखपुर। जिंदगी के अंतिम पड़ाव में बेघर हुए 82 वर्षीय विश्वनाथ गुप्ता को तुर्कमानपुर मोहल्ले के इजहार ने अपने घर के चबूतरे पर आश्रय दिया तो रूबी, गुड़िया, सईदुन सहित मोहल्ले की कई महिलाएं उनके खाने पीने का इंतजाम करती हैं। सफाई कर्मी जमील हफ्ता-पंद्रह दिन में उन्हें नहला धुला कर कपड़े बदलवाते हैं। देखने में असमर्थ विश्वनाथ की आंखों की रोशनी वापस लाने के लिए अब मोहल्ले वाले उनके मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने की तैयारी कर रहे हैं। विश्वनाथ गुप्ता की सेवा हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए मिसाल है।
मोहल्ले के परवेज बताते हैं कि विश्वनाथ गुप्ता तीन साल से बेघर हैं। वह मोहल्ले में इधर-उधर जीवन गुजार रहे थे। आठ माह पहले गंभीर रूप से बीमार पड़े तो मौत होने की आशंका पर सब लोग उन्हें भगाने लगे। इजहार ने विश्वनाथ को अपने चबूतरे पर पनाह दी और इलाज कराया। सफाई कर्मी जमील फज्र भोर पहर की नमाज अदा करने के बाद मोहल्ले में झाडू़ देते हैं और विश्वनाथ को सुबह की चाय पिलाते हैं। आठ बजे के करीब मोहल्ले की सईदुन, गुड़िया, रूबी, फलक या पकौड़ी का ठेला लगाने वाली भाभी के नाम से मशहूर महिला उनके लिए पराठा, पकौड़ी, जीरा आदि लाती हैं। दोपहर और रात में भी मोहल्ले के छह सात परिवार उनके खाने का इंतजाम करते हैं। कई बार कोई भी चाय-नाश्ता या खाना लेकर नहीं आता तो इजहार इंतजाम करते हैं।
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मोतियाबिंद के ऑपरेशन को इकट्ठा किया धन
मोतियाबिंद की समस्या से जूझ रहे विश्वनाथ गुप्ता ने लोगों से मिली मदद के रूप में छह हजार रुपये जमा किए। यह रुपये उन्होंने इजहार के पास जमा करवाए हैं। इजहार कहते हैं कि विश्वनाथ की आंखों का ऑपरेशन मोहल्ले वाले खुद चंदा कर कराने को तैयार हैं। छह हजार रुपये मृत्यु होने पर उनके अंतिम संस्कार के लिए रख लिए गए हैं ताकि कोई यह नहीं कह सके कि चंदे से अंतिम संस्कार किया गया।
युवराज की तरह बिताया था जीवन
अपने समय के मशहूर किराना व्यापारी मिश्रीलाल सेठ के इकलौते बेटे विश्वनाथ गुप्ता का पैतृक आवास तुर्कमानपुर मोहल्ले में नई मस्जिद के पास था। घर में दस नौकर-नौकरानियां थीं, आज एक चाय के लिए दूसरों पर आश्रित विश्वनाथ सस्ते दौर में भी दोस्तों और परिचितों पर एक बार में पांच सौ रुपये तक खर्च कर देते थे। अब चबूतरे पर जीवन बिता रहे विश्वनाथ बताते हैं कि चोट लगने के कारण उन्होंने शादी नहीं की, करीब तीस साल पहले पिता की मौत हो गई। पिता की मौत के बाद ही चाचा भगौती प्रसाद ने मकान बेच दिया और वह बेघर हो गए। अनुसूचित जाति के एक लड़के को बेटा बनाया और उसके घर पर रहने लगे। मुंहबोला बेटा हत्या के केस में फंस गया तो उन्होंने लाखों रुपये खर्च कर सुप्रीम कोर्ट तक पैरवी की और बरी करवाया। डेढ़ साल पहले मुंहबोले बेटे की मौत हो गई और उनकी भी दौलत चुक गई। बेटे की मौत के बाद ही बहू ने बाहर निकाल दिया।
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धूप-बरसात में मस्जिद का सहन बनता है आश्रय
मोहल्ले के इरशाद अहमद बताते हैं कि गर्मी में दोपहर की धूप और बरसात में भीगने से बचने के लिए विश्वनाथ गुप्ता के लिए मस्जिद सुल्तान खां का सहन आश्रय बनता है। मो. अब्दुल्लाह समय समय पर विश्वनाथ के लिए कपड़ों का इंतजाम करते हैं। सर्दी बढ़ने के पहले ही उनके लिए गर्म कपड़ों का इंतजाम कर दिया गया है। सफाई कर्मी जमील उनके कपड़े बदलते हैं और मोहल्ले का नाई समय समय पर उनके बाल काटता है।
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