सरस्वती देवी का सहारा बनीं बेटियां, फाइल तस्वीर
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बेटों की परवरिश की परवाह के आगे जिस मां ने अपनी तकलीफों को भुला दिया, जब उसी ने अंतिम सांस ली तो बेटे अर्थी उठाने और मुखाग्नि देने नहीं पहुंचे। बेटों के ठुकराने के बाद मां अपनी बेटी की ससुराल में रह रही थी। मां की मौत की सूचना देने के बाद भी जब भाई नहीं आए तो बेटी ने ही बेटे का फर्ज अदा करते हुए मुखाग्नि दी।
मामला पीपीगंज क्षेत्र के तिघरा गांव का है। यहां के रामवृक्ष के तीन पुत्र और दो पुत्रियां हैं। गांव के लोगों के अनुसार पांच वर्ष पूर्व तीनों बेटों ने बूढ़े मां-बाप की देखभाल करना छोड़ दिया। रामवृक्ष की पत्नी सरस्वती देवी अक्सर बीमार रहने लगीं। धीरे-धीरे उनकी आंख की रोशनी भी चली गई। उसके बाद बेटे रामदवन, देवीलाल और राजकुमार ने मां का इलाज कराने से हाथ खड़े कर दिए।
उसके बाद रामवृक्ष और सरस्वती देवी की देखभाल का जिम्मा उनकी शादीशुदा दोनों बेटियों शांति और कुसुम ने उठाया। पांच साल से वे ही माता-पिता की देखभाल कर रही थीं। बड़ी बेटी शांति आर्थिक मदद करती थीं। दूसरी बेटी कुसुम मां-बाप को भुईधरपुर गांव में अपने घर लाकर देखभाल कर रही थीं। कुसुम के पति रूदल का पूर्व में ही देहांत हो चुका है।
दो साल पहले रामवृक्ष की भी मौत हो चुकी है। इधर रविवार की रात सरस्वती देवी ने भी दम तोड़ दिया। उसके बाद कुसुम ने भाइयों को सूचना दी। पर भाई नहीं आए। फिर कुसुम ने ससुराल के लोगों की मदद से अर्थी के साथ सिसई घाट पर पहुंची और पूरे मां का दाह संस्कार किया।
तीन बेटों के होते हुए मां मां को जब बेटी ने मुखाग्नि दी तो वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। हर कोई बेटों को कोसता दिखा।