अक्षय कुमार की हालिया फिल्म ‘पैडमैन’ ने दर्शकों का ध्यान महिलाओं को पीरियड्स के दौरान सेनेटरी पैड का इस्तेमाल न करने से होने वाली बीमारियाें की तरफ खींचा है। वह फिल्म थी। इसे हकीकत में दो साल पहले से ही खोराबार ब्लॉक की 15 महिलाओं का समूह जी रहा है। इन्होंने न केवल इसे रोजगार बनाया बल्कि सेनेटरी नैपकिन के इस्तेमाल के प्रति महिलाओं को जागरूक भी कर रही हैं। गोरखपुर की इन ‘पैडवूमेन’ की चर्चा आसपास के जिलों तक भी हो रही है।
इन महिलाओं के जोश और जज्बे को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ‘अमर उजाला’ सलाम करता है। उनकी इस मुहिम में जिला पंचायत उद्योग विभाग ने बखूबी साथ दिया। मैनुअल और आटोमेटिक मशीनों से लैस इस केंद्र पर 15 रुपये (6 पीस) में सेनेेेटरी नैपकिन और 48 रुपये (6 पीस) में मैटरनिटी पैड तैयार की जाती है। इसके बाद इन्हें मार्केेंट भेजा जाता है। हर दिन ये पैडवूमेन करीब 3000 सेनेटरी पैड का निर्माण करती हैं।
चूल्हा-चौका के साथ स्वरोजगार
पैड बनाने वाली ज्यादातर महिलाएं शादीशुदा हैं। कुछ बेटियां ऐसी हैं, जो अभी पढ़ाई कर रही हैं। ये रोजाना घर पर चूल्हा-चौका निपटाने के बाद सुबह नौ बजे केंद्र पहुंचती हैं और शाम पांच बजे तक सेनेटरी नैपकिन और मेटरनिटी पैड बनाती हैं।
दिशा है सेनेटरी पैड का नाम
इस सेनेटरी पैड को ‘दिशा’ नाम दिया गया है। ट्रेनर अलका ने बताया कि इसे बनाने के लिए रुई धुनने के बाद उसे आकार देने के लिए सांचे में ढाला जाता है। फिर मजबूती के लिए पैड पर बैक लेयर लगाई जाती है। सिलाई करने के बाद स्टीकर लगाया जाता है। फाइनल पैंकिंग से पहले पैड को स्टरलाइज भी किया जाता है।
ये महिलाएं हैं मिसाल
अनीता, खुशबू, रीतू, नीतू, शकुंतला, अनीता, नीरज, पूनम, संगीता, सरिता, गुड़िया, संजू, ममता, पिंकी और ट्रेनर अलका।
सरकार की मदद से इस सफर की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे महिलाओं में जागरूकता आई और उन्होंने इसे स्वरोजगार बना लिया। एक दिन में 3000 हजार पैड तैयार होते हैं। इन्हें आशा बहुओं के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं तक भेजने की व्यवस्था बनाई गई है।
- संतोष कुमार तिवारी, निरीक्षक, जिला पंचायत उद्योग विभाग