अपने घर में बुजुर्ग महिलाओं व अपनी बेटी के साथ कनक मिश्रा।
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आठ साल पहले लखनऊ से परास्नातक कर शहर लौटीं कनक मिश्रा ने एक बेसहारा बुजुर्ग महिला को सड़क पर तड़पते देखा तो उन्हें जीने का मकसद मिल गया। कनक उन्हें घर ले आईं। इसके बाद एक-एक कर 43 ऐसी महिलाएं उनके संपर्क में आती रहीं और उनका कुनबा बड़ा होता रहा। कनक ने न सिर्फ इन महिलाओं को मां की तरह संभाला, बल्कि अपना कॅरियर भी संवारा। कलेक्ट्रेट की इस अफसर की जीवन गाथा खुद में मिसाल है।
कनक बताती हैं कि उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से सोशल वर्क में परास्नातक पूरा किया और 2010 में घर आ गईं। उन्होंने बेसहारा महिलाओं को लाना शुरू किया तो घरवालों ने भी पूरा सहयोग किया। इसी बीच 2012 में शादी हुई और अगले साल ही कलेक्ट्रेट में नौकरी भी लगी। उन्होंने बताया कि पहले सेवा करने में आर्थिक परेशानी आती थी। नौकरी मिलने से यह संकट खत्म हो गया। शहर की कुछ समाजसेवी संस्थाएं भी मदद को आगे आ रही हैं।
इन महिलाओं की देखभाल के लिए उन्होंने 12 कर्मचारी भी रखे हैं। उनकी 6 साल की बेटी अद्वित्रि भी सभी के साथ घुल-मिल गई है। कनक ने बताया कि अब तो जब वह बाहर से घर लौटती हैं तो बेटी अपनी नानियों की परेशानी और जरूरत खुद उनसे साझा करती है।