सरकारी विभाग के अधिकारियों के कानून कायदे शायद कागजों तक ही सीमित हैं। ऐसा हम नहीं बोल रहे, उनका कार्यप्रणाली ही इसे दर्शाती है। वन विभाग के अधिकारियों की तरफ से कागज में विशेष तौर पर नागपंचमी के मौके पर सपेरों को पकड़ने व कानूनी कार्रवाई करने की टीम बनी थी। पूरे शहर में वन विभाग के अधिकारी तो नहीं दिखे अलबत्ता कंधे पर पिटारा टांगे तो कहीं सांप की कलाबाजी दिखाते मंदिरों से लेकर शहर के बीच सपेरे जरूर दिखे।
वन विभाग की नियमावली में सांप शेड्यूल 1 व 2 में आते हैं। इन्हें पकड़ना, पालना दोनों ही अपराध है। इस अपराध के दंड में जेल तक होने का प्रावधान है। अमर उजाला लगातार सांप को दूध नहीं पिलाने की अपील के साथ वन विभाग के अधिकारियों से ऐसे सपेरों पर कार्रवाई करने की खबरें भी प्रकाशित करते आ रहा है। लेकिन लगता है कि अधिकारियों को जमीन पर काम करने की आदत खत्म सी हो गई है।
मोहद्दीपुर गोपाल मंदिर के पास सुबह से ही सपेरे सांप को पिटारे से निकाल कर आने-जाने वाले लोगों को दर्शन करा रहे थे। कुछ तो साथ में रखा दूध भी पिलवा रहे थे। दूध नहीं होने की स्थिति में उनसे इस बाबत रुपये ले रहे थे। ऐसे ही झारखंडी महादेव मंदिर के पास तो लाइन से ही पिटारा लेकर सपेरे बैठे थे। कुछ तो लाइन के पास आकर लोगों से पिटारा खोल कर दर्शन कर उसमें चढ़ावा चढ़ाने को बोल रहे थे। जगन्नाथपुर इलाके में भी शाम को दो सपेरे अलग-अलग टुकड़े में घूम रहे थे। एक सपेरा तो सड़क पर ही सांप को खोलकर नुमाइश लगा रखा था। आने-जाने वाले श्रद्धा स्वरुप चढ़ावा चढ़ा दूध तक पिला रहे थे।