सेमिनार में न्यूज लेटर जारी करते अतिथिगण।
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ट्रांसलेशन एक यूरोपियन अवधारणा है, जबकि अनुवाद भारतीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। दोनों को एक ही तराजू में तौलना गलत है। अनुवाद, अनुवचन एवं अनुकथन के बीच अंतर समझना चाहिए एवं भारतीय शिक्षा की ऐतिहासिक परंपरा यादकर भामा, पाणिनी का योगदान नहीं भूलना चाहिए। यह कहना है डॉ. भीमराव अंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं ट्रांसलेशन स्टडीज इग्नू के पूर्व निदेशक प्रो. एके सिंह का। वह गोरखपुर यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग की ओर से आयोजित ‘ट्रांसलेशन स्टडीज: पोयटिक्स, पोलिटिक्स एंड वियांड’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मशीनी ट्रांसलेशन भारतीय साहित्यिक अनुवाद की परंपरा के लिए खतरा बन रहा है। अध्यक्षता करते हुए कुलपति डॉ. पृथ्वीश नाग ने कहा कि अनुवाद राष्ट्रीय एकीकरण के लिए आवश्यक है, क्योंकि अनुवाद द्वारा विभिन्न भाषाओं के विचार एक से दूसरे संस्कृति में प्रसारित हो सकते हैं। संगोष्ठी की संयोजिका प्रो. नंदिता सिंह ने कहा, ट्रांसलेशन स्टडीज 21वीं शताब्दी के लिए जरूरी है। आयोजन सचिव प्रो. अजय शुक्ल ने कहा कि 21वीं को ट्रांसलेशन का युग कहते हैं।
इस मौके पर डॉ. आलोक सिंह, डॉ. शिखा सिंह, प्रो. मधु सिंह, प्रो. विनोद सोलंकी समेत कई शिक्षक मौजूद थे। कार्यक्रम के आयोजन में परास्नातक के छात्र-छात्राओं शुभम, नीलम, शिवप्रसाद, मोनू, अभिषेक, अपूर्वा, कंचन, शिंजा, सुनील, विश्वजीत, रवि, सुप्रिया, शिप्रा, विनीत, पूर्णिमा, ज्योति, प्रांची का विशेष सहयोग रहा। इस दौरान न्यूज लेटर ‘सेमिकॉन’ का लोकार्पण किया गया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. हुमा सब्जपोश ने किया।