राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने कहा कि ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी विभेदकारी प्रवृत्तियों की वजह से आज हिंदू समाज गंभीर चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। अब समय आ गया है कि जब संत भारतीय समाज को उसके सांस्कृतिक जीवन के शाश्वत मूल्यों के प्रति आग्रही बनाने तथा सामाजिक कुरीतियों को त्याग कर नई परंपराओं के सृजन के लिए मार्गदर्शन करें। भारतीय संत सभा इस दायित्व का निर्वहन करने के लिए देशभर के साधु संतों को संगठित कर जन-जागरण अभियान का हिस्सा बनाए।
गोरखनाथ मंदिर में तीन दिवसीय संत सभा-चिंतन बैठक का उद्घाटन करने के बाद उन्होंने कहा कि दुनिया में कई सभ्यताएं नष्ट हो गईं, लेकिन भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता आज भी तमाम झंझावतों के बावजूद अनवरत विकासमान है। भारत के भारत बने रहने के पीछे उसकी आध्यात्मिक शक्ति एवं संत समाज का निरंतर मार्गदर्शन रहा है। बुंदेलखंड में क्षत्रिय पिता और मुस्लिम मां होने के बावजूद उसके बच्चों को मुस्लिम नाम देना पड़ा। उस इलाके में अब भी ऐसे 600 परिवार हैं। तलवार के बल पर समाज का कई हिस्सा धर्मानांतरित हुआ, किंतु विदेशी आक्रांताओं के युग में तलवार के बल पर मतांतरित अपने पूर्वजों के ताम्रपत्र हमें उनके घर वापसी का संदेश दे रहे हैं। संत समाज बांहें फैलाकर अपने बंधु-बांधवों का मार्ग प्रशस्त करे। अन्यथा न तो हमारे पूर्वज हमें माफ करेंगे और न ही भावी पीढ़ी।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे भारतीय संत सभा के राष्ट्रीय संयोजक संत गोविंद देवगिरि ने कहा कि इस सभा में संतों की जमात शासन और सत्ता के लिए नहीं बल्कि समाज, भारत माता और मानव के कल्याण के लिए जुटी है। हिमालय से कन्या कुमारी तक राष्ट्रीय समाज खड़ा हो जाए तभी हम भारत और विश्व का कल्याण कर सकेंगे। संत इस मंत्र को लेकर आगे बढ़ें कि हर भारतीय का रक्त भारत माता का है और वह हिंदुत्व के लिए समर्पित है। उन्होंने कहा कि हमारी यह सभा महायोगी गोरक्षनाथ की तप:स्थली पर हो रही है, जिन्होंने भारत के समाज को तब दिशा दी थी जब वह पाखंडों तथा बाहरी आक्रांताओं से जूझ रहा था। गोरक्षनाथ की प्रेरणा तथा भारतीय ऋषियों की सनातन परंपरा का अनुसरण करते हुए हमें समरस हिंदू समाज की फिर से प्रतिष्ठा का संकल्प लेकर गांव-गांव चलना पड़ेगा।
महंत आदित्यनाथ ने कहा कि संत समाज को सामाजिक पुनर्जागरण अभियान प्रारंभ करना चाहिए। हम ऐसे गौरवशाली परंपरा के वाहक हैं जहां महिलाएं पुरुषों के समान वैदिक मंत्रों की रचयिता थीं। विवाह अनुबंध नहीं समानता के आधार पर संपादित संस्कार है। कण-कण में परमात्मा के अंश का दर्शन करने जैसी दार्शनिक विचारधारा है। श्रेष्ठतम जीवन मूल्यों के सृजनकर्ताओं के हम वंशज हैं। ऐसे हिंदू समाज में जाति पाति, ऊंच-नीच, छुआछूत, शास्त्र सम्मत कैसे हो सकता है। यदि हम संकल्पबद्ध होकर कार्य करें तो भारत की आधी आबादी तक हमारी पहुंच हो जाएगी।
देशभर में 12 लाख से अधिक साधु-संत एवं संन्यासी हैं। अनेक संत- महात्माओं की लंबी शिष्य परंपरा है। इस शक्ति के माध्यम से हम हरेक लोगों तक समरसता का भाव पैदा कर सकते हैं। कार्यक्रम में हजार से ज्यादा साधु-संत शामिल हुए। संचालन धर्मजागरण समन्वय विभाग के राष्ट्रीय संयोजक राजेंद्र ने किया।