गोरखनाथ मंदिर में मंगलवार से शुरू हुई भारतीय संत सभा-चिंतन बैठक में जहां राम मंदिर के मुद्दे पर गंभीर मंथन किया गया, वहीं राम मंदिर के लिए केंद्र सरकार में मोदी को जरूरी मानते हुए भाजपा से सांसद आदित्यनाथ को यूपी के अगले मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने की अपेक्षा जताई गई। इसके लिए बैठक में मौजूद आरएसएस सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल के माध्यम से संतों की सहमति का प्रस्ताव भाजपा नेतृत्व तक भेजा जाएगा।
गोपनीय बैठक के बाद बातचीत में महामंडलेश्वर स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला राम मंदिर के पक्ष में आता है तो जरूरी है कि उत्तर प्रदेश का नेतृत्व ऐसे शख्स के हाथ में हो जो युवा हो और राम मंदिर बनाने के प्रति कृतसंकल्प हो। जरूरत पड़ने पर हर तरह की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो। यूपी में अगर सपा या बसपा की सरकार होगी तो केंद्र में मोदी सरकार होने के बावजूद राम मंदिर के निर्माण में अड़चन आएगी। अखिलेश युवा हैं। इसलिए भाजपा को भी युवा मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करना चाहिए। भाजपा को यूपी के लिए अपने दल के संभावित मुख्यमंत्री का नाम और चेहरा जल्द सार्वजनिक करना चाहिए, क्योंकि प्रदेश के विधानसभा चुनाव में ज्यादा वक्त नहीं बचा है।
उन्होंने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारी 2011 में ही कर ली गई थी। 2011 में अहमदाबाद में और 2012 के कुंभ में आयोजित संतों की खुली बैठक में संतों ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने का प्रस्ताव किया था। इस पर अमल हुआ और दो तिहाई बहुमत से केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। इस सरकार के बनने यूपी की जनता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यूपी के लोग नरेंद्र मोदी को भाजपा के नेता के बजाय गोधरा के नायक रूप में देखते हैं। इसी विचारधारा का व्यक्ति राम मंदिर के निर्माण के लिए भी जरूरी है।
चिन्मयानंद जी महाराज ने कहा कि भारतीय संत सभा-चिंतन बैठक में आरएसएस के सह सरकार्यवाह डॉॅ. कृष्ण गोपाल भी शामिल हुए हैं। वह संत सभा चिंतन-बैठक की सोच और प्रस्ताव को भाजपा केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाएंगे, क्योंकि आरएसएस केवल एक संस्था नहीं है बल्कि केंद्र सरकार और आरएसएस के बीच सेतु के रूप में है। हालांकि हमारा किसी के नाम पर जोर नहीं है, आखिरी फैसला तो नेतृत्व को करना है।
आरक्षण पर मोहन भागवत ही नहीं, मोदी के बयान से बिहार में हारे
चिन्मयानंद जी महाराज ने कहा कि बिहार चुनाव में हम केवल आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान की वजह से हार गए। जहां मोहन भागवत के बयान से आरक्षित वर्ग के मन में संशय पैदा हो गया वहीं नरेंद्र मोदी के ‘आरक्षण को कोई खत्म नहीं कर सकता’ जैसा बयान देने से गैर आरक्षित वर्ग भी भाजपा का विरोधी हो गया। आरक्षण से जु़ड़े भ्रम से सामाजिक समरसता पर पड़ रहे असर को समझना चाहिए। जब तक आरक्षित वर्ग की ओर से इसके विरोध में स्वर उठना शुरू नहीं होता तब तक आरक्षण का मुद्दा नहीं उठाया जाना चाहिए।