अब तक फुटकर दुकानों पर फार्मासिस्ट की अनिवार्यता का विरोध कर रहे दवा व्यापारियों को एक और झटका लगा है। केंद्र सरकार ने 28 दिसंबर को गजट जारी कर कानून में संशोधन करते हुए थोक दुकानों पर भी फार्मासिस्ट को अनिवार्य कर दिया है। इसे लेकर बुधवार को दवा विक्रेता संघ के अध्यक्ष योगेंद्र नाथ दुबे, महामंत्री आलोक चौरसिया ने व्यापारियों के साथ बैठक कर विरोध जताया है। उन्होंने व्यापारियों से आंदोलन के लिए तैयार रहने की अपील की है।
उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार ने वर्ष 1999 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएल शर्मा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय आयोग गठित किया था। वर्ष 2004 में प्रदेश सरकार को सौंपी रिपोर्ट में आयोग ने फुटकर दुकानों के लिए बिजनेस फार्मासिस्ट या योग्य दवा फार्मासिस्ट नियम लागू करने का सुझाव दिया था। कहा गया था कि तीन माह का प्रशिक्षण देकर दवा दुकानदारों को ही फार्मासिस्ट का दर्जा दे दिया जाए। वे सरकारी नौकरी के लिए तो योग्य नहीं होंगे लेकिन दुकान चला सकेंगे। अब दवा की दुकानों पर बनी बनाई दवाएं आती हैं और उन पर नाम छपे होते हैं। दुकानदार बस नाम देखकर दवाएं दे देते हैं। ग्यारह साल बीत जाने के बाद भी न्यायमूर्ति केएल शर्मा आयोग की रिपोर्ट पर अमल नहीं हुआ है।
दवा विक्रेताओं का मानना है कि इस रिपोर्ट को लागू कर बिजनेस फार्मासिस्ट को मान्यता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार की इस नीति से लाखों दवा व्यापारी बेरोजगार हो जाएंगे।