बाढ़ से घिरे गांवों में रह रहे तमाम लोगों तक अभी भी खाने के पैकेट, पानी और दवाइयों समेत जरूरी राहत सामग्री नहीं पहुंच पा रही है। मवेशियों की हालत तो और भी खराब है, बीमारी का खतरा अलग से । कई जगहों से राहत मांग रहे बाढ़ पीड़ितों के साथ बदसलूकी के मामले भी सामने आ रहे हैं।
बारिश से बचने के लिए करमहा कला के पूर्व प्रधान दिनेश निषाद के नेतृत्व में शनिवार की शाम जब ग्रामीण मछरिहाघाट पर पन्नी मांगने पहुंचे तो कैंपियरगंज एसडीएम पूजा मिश्रा से उनकी नोकझोंक हो गई। आरोप है कि एसडीएम ने ग्रामीणाें से अभद्र भाषा का प्रयोग किया। गांव के लोगों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने राहत सामग्री का विरोध शुरु कर दिया और खाने के पैकेट व दवाएं वापस लौटा दीं। हियुवा नेताओं के हस्तक्षेप और बांसगांव के एसडीएम अमरेंद्र वर्मा के साथ जब कैंपियरगंज की एसडीएम ने रविवार को गांव पहुंचकर खेद प्रकट किया तब ग्रामीण माने। यह हालत तब है कि जबकि इस गांव में मुख्यमंत्री योगी खुद पहुंचे थे और प्रशासन को पूरी मदद मुहैया कराने का निर्देश दिया था।
राहत सामग्री को लेकर प्रशासन के इंतजाम के दावों की पोल खुल चुकी है। पूरी व्यवस्था उद्योगपतियों, व्यापारियों और समाजसेवियों पर ही टिकी है। पीपीगंज स्थित बापू इंटर कॉलेज के पास एक मैरेज हाल में प्रशासन रोजाना आठ हजार लोगों के खाने का पैकेट तैयार कराने का दावा कर रहा है। इनमें कुछ पैकेट शहर के बरगदवां, धर्मशाला और अग्रवाल टिफिन सेंटर पर तैयार कराकर मंगाए जाने की बात कही जा रही है। मगर बाढ़ से प्रभावित सवा लाख की आबादी में यह तैयारी भी ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है। आंकड़ों में खेल को लेकर प्रशासन पर अलग से आरोप लग रहे हैं।
सोनबरसा, बालापार, रामपुर, गोपालपुर, बनकपुरा, मारवाड़ी कोठी, विशुनपुरा, करमहा कला, करमहा खुर्द, भैसाड़ी, छोटा परसौना, बड़ा परसौना, बढ़नी समेत गहरे पानी में फंसे दूर दराज के तमाम ऐसे गांव हैं जहां प्रशासन की राहत सामग्री वाली नाव नहीं पहुंच पा रही है। बीच रास्ते में पड़ने वाले गांव तक ही राहत सामग्री खत्म हो जा रही है। वहां के लोगों तक दो-दो दिन पर बमुश्किल एक बार खाने के पैकेट या चूड़ा, गुड़ पहुंच पा रहा है। लकड़ी भीग जाने और रसोई गैस खत्म होने की वजह से पीड़ितों के खुद के इंतजाम भी खत्म हो गए हैं। चोरी के भय से वे घर भी नहीं छोड़ पा रहे। मजबूरन घरों के पुरुष, महिलाओं और बच्चों को बाहर निकाल भूखे पेट रहकर खुद घर की रक्षा कर रहे है।
राहत शिविर पर जोर, बंधे के लोग भगवान भरोसे
जिला प्रशासन के मुताबिक उनके 36 राहत शिविर चल रहे हैं जिनमें 17135 शरणार्थियों को आसरा दिया गया है। इनमें सदर तहसील के 25 शिविर में 11550 तथा कैंपियरगंज के नौ शिविर में 5485 लोग रह रहे हैं। जबकि बाढ़ में फंसे लोग प्रशासन के इस दावे को झूठा बता रहे हैं। मानीराम में लोग स्टेशन पर रहने को मजबूर है तो शहर के तमाम मोहल्ले के लोग हार्वर्ट बंधे पर आसरा बनाए हुए हैं। पड़ताल में वहां लालडिग्गी के पास बाल विहार स्कूल, डोमिनगढ़ में जेएन पब्लिक स्कूल और आमना विद्यालय में ही राहत शिविर संचालित होता पाया गया। इन तीनों राहत शिविरों में करीब चार सौ से पांच सौ लोग रहे रहे है। इनके खाने-पीने का इंतजाम सदर तहसील प्रशासन के जिम्मे है। तहसील प्रशासन का दावा है कि राहत शिविर समेत हार्वर्ट बंधे पर रह रहे लोगों के लिए वे रोजाना खाने और पानी के आठ हजार पैकेट भेजवा रहे हैं । मगर राहत शिविर को छोड़ बंधे पर रह रहे सैकड़ों लोगों का कहना है कि उन्हें पांच दिन के भीतर प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली।
दूसरे दिन नहीं उड़ पाया हेलीकाप्टर
18 अगस्त को हेलीकाप्टर से राहत सामग्री के वितरण के बाद जिला प्रशासन अगले दिन हेलीकाप्टर की मदद नहीं ले पाया। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक समय पर खाने-पीने के पर्याप्त पैकेट नहीं उपलब्ध हो पाने की वजह से ऐसा हुआ। एयरफोर्स प्रशासन मदद के लिए तैयार था मगर पर्याप्त संख्या में पैकेट नहीं हो पाने की वजह से प्रशासन ही हेलीकाप्टर की मदद नहीं ले सका।
बोले पीड़ित
नौ भाइयों की पूरी 90 डिसमिल की खेती बरबाद हो गई। पानी इतनी तेजी से गांव में घुसा कि बचाव का मौका ही नहीं मिला। पूरा सामान पानी में डूब गया। खाने के लाले पड़ गए हैं । कोई मदद को भी नहीं आ रहा। कभी चूड़ा गुड़ मिल जा रहा तो कभी मोमबत्ती। आधे पेट समय काटने को मजबूर हैं।
: मार्कंडेय, करमहा कला
पानी में पूरा सामान बह गया। दो बेटो और चार बेटियों के साथ 10 लोगों का पूरा परिवार बंधे पर जिंदगी गुजारने को मजबूर है। भागते-भागते खाने-पीने को जो हाथ लगा था वह खत्म हो गया है। नाव से जो खाना, पानी आ रहा है उसे पाने के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है। कभी दो पैकेट हाथ लगता है तो कभी तीन।
: रामदरश, करमहा खुर्द
दो दिनों से पूरा परिवार चूड़ा के सहारे है। डेढ़ किलोमीटर दूर पूड़ी, सब्जी बंटने की सूचना मिली तो दौड़कर गया था। पहुंचा तो बड़ी भीड़ लगी थी। बहुत मिन्नतों के बाद किसी तरह तीन पैकेट मिला। बंधे पर रहने को इसलिए मजबूर है कि यहां से घर दिखाई देता है। निगरानी हो जाती है। छोड़ कर कहीं चले गए तो चोरी हो जाएगी।
: इंद्रेश, डोमिनगढ़
परिवार के लिए तो कुछ न कुछ इंतजाम हो जा रहा है। मगर मवेशियों का हाल खराब है। सारा चारा और अनाज पानी में डूब गया। पैसे भी खत्म हो रहे। भूसे का दाम भी बढ़ गया है। चारा तो कहीं मिल ही नहीं रहा। डर है कि मवेशियों को कुछ न हो जाए। वह भी तो परिवार का ही हिस्सा है। खुद के साथ उनकी भी चिंता सताए जा रही है।
: रामफल, बहरामपुर दक्षिणी
तहसील शिविर शरणार्थी नाव
सदर- 25 11550 98
कैंपियरगंज- 9 5485 113
गोला - - 26
चौरीचौरा 1 100 16
सहजनवां 1 - 29
खजनी - - 47
बांसगांव 16