गोरखनाथ सिद्ध हैं और शुद्ध भी : मोरारी बापू
गोरखपुर। भारतीय आध्यात्म में नौ नाथ हैं। सभी नाथ अपनी विशेषता रखते हैं लेकिन गोरखनाथ सिद्ध भी हैं और शुद्ध भी। वह मरे हुए को जिंदा करने की क्षमता रखते हुए भी किसी जीवित को मारते नहीं बल्कि जिलाते हैं। गुरु गोरखनाथ के व्यक्तित्व की यह व्याख्या संत मोरारी बापू ने रामकथा के आठवें दिन गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष के प्रश्न पर की। शनिवार को संत मोरारी बापू ने बाबा गोरखनाथ और गुरु मत्येंद्र नाथ के बीच हुई आध्यात्मिक प्रश्नोत्तरी की व्याख्या और सीता स्वयंवर, विवाह और विदाई का प्रसंग का श्रद्धालुओं को रसपान कराया।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष ने बापू से प्रश्न किया कि मत्स्येंद्र नाथ, भर्तृहरि, गोपीचंद और गोरखनाथ को किस क्रम में जोड़ना चाहेंगे? बापू ने कहा विभागाध्यक्ष ने नौ नाथों में से सिर्फ चार नाथ को ही चुना यह अच्छी बात है। भर्तृहरि बड़े योगी हैं। वह अलख निरंजन के ज्ञानी लेकिन विषयी हैं। अपने भोग के लिए मृग का वध कर लौट रहे थे तो गुरु गोरखनाथ के दर्शन हुए। गोरखनाथ ने नाम लेकर पुकारा, इसपर भर्तृहरि ने पूछा कि आपने कैसे जाना? गोरखनाथ ने बताया कि तू मृग का वध करके आ रहा है। तू किसी को जिला नहीं सकता तो तुझे किसी को मारने का हक नहीं है। मैं जिला सकता हूं फिर भी किसी को मारता नहीं हूं। भर्तृहरि को बहुत ग्लानि हुई। गोरखनाथ ने मंत्र से मृग को जीवित कर दिया। भर्तृहरि को दीक्षा देने के लिए गोरखनाथ ने शर्त रखी कि सब छोड़ना होगा और रानी पिंगला से भिक्षा मांगनी होगी, वह भी माता के संबोधन के साथ।
गोपीचंद साधक थे। गोपीचंद अपनी जवानी में स्नान कर रहे थे तो आठ रानियां उसके शरीर की मालिश करने लगीं। छत से बेटे को निहार रही मां मैनावती की आंखों से दो आंसू टपके जो गोपीचंद के शरीर पर जा पड़े। गोपीचंद ने माता से रोने का कारण पूछा। मैनावती ने बताया कि तेरी देह देख कर तेरे पिता की काया की याद आ गई। उनका शरीर भी ऐसा ही बलवान था लेकिन वह शरीर चला गया। गोपीचंद की तंद्रा टूटी पूछा मां क्या करना चाहिए। मां मैनावती ने कहा कि 12 साल तक राज करना लेकिन 13वें साल वैराग्य ग्रहण कर लेना। संत मोरारी बापू ने बताया कि नाथ परंपरा में 12 का बहुत महत्व है। बोले कि गुरु मत्स्येंद्र नाथ सिद्ध हैं लेकिन गोरखनाथ सिद्ध भी हैं और शुद्ध भी हैं। गोरखनाथ शुद्धता की पराकाष्ठा हैं। शुद्ध की महिमा बहुत बड़ी है।
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भगवत गीता, राम चरित मानस और नाथ संहिता में 32 बार आया है जोगी शब्द
योगी गुरु गोरखनाथ के प्रसंग की चर्चा करते हुए संत मोरारी बापू ने अनोखे संयोग की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि भगवत गीता में जोगी शब्द 32 बार आया है। एक जगह योगींद्र शब्द आया है, इसलिए इसे 33 कहा जा सकता है लेकिन सिर्फ जोगी शब्द 32 स्थानों पर लिखा गया। रामचरित मानस में भी जोगी शब्द का इस्तेमाल 32 बार हुआ है।
संत मोरारी बापू कहते हैं कि दोनों महाकाव्यों में जोगी शब्द 32 बार आना कुछ संकेत देता है। उन्होंने भगवत गीता के तीसरे से लेकर 18वें अध्याय में उद्धृत किए गए जोगी शब्दों की व्याख्या की। गीता में कर्म योेग, संन्यास योग, आरंभ संयोग, अक्षय ब्रह्मयोग, वृत्ति योग, पुरुषोत्तम योग, मोक्ष संन्यास योग सहित 32 प्रकार बताए गए हैं।
रामचरित मानस में जिन छंद और चौपाइयों में जोगी शब्द का प्रयोग किया गया उनका वाचन किया। रामचरित मानस में बाल योगी, युवा योगी और तापस योगी के बारे में विस्तार से बताया। बापू ने बताया कि मानस के सुंदर कांड में किसी योगी का जिक्र नहीं है, इसका कारण यह है कि सुंदर कांड रावण की लंका का है। अरण्य कांड में सभी योगी तापस योगी हैं। गुरु गोरखनाथ की तरह तपस्या करने वाले। संत मोरारी बापू ने बताया कि नाथ संहिता में नाथ शब्द भी 32 बार आया है।
चंपा देवी पार्क में राम कथा सुनाते मोरारी बापू विभिन्न मुद्राओं में।