सिख व पंजाबी समाज के लिए शनिवार का दिन लोहड़ी की वजह से खास था। उमंग व उल्लास के त्योहार को रीति-रिवाज के साथ मनाया गया। शाम होते ही अग्नि को लोहड़ी समर्पित कर ‘भंगड़ा दे बारी..., दूल्हा भट्टी वाला..., दूल्हे की ती ब्याही...’ जैसे गीतों और भंगड़े का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह देर रात तक चलता रहा।
शहर के सिखबहुल मोहल्लों में शुक्रवार को त्योहार का असर सुबह से ही सिख व पंजाबी घरों में दिखने लगा। तरह-तरह के व्यंजनों के साथ लोहड़ी की तैयारी का क्रम दिन भर चला। शाम होते ही पहले लोगों ने अपने-अपने घरों में लोहड़ी जलाई, फिर पहले से नियत सामूहिक स्थान पर पहुंच कर अरदास के साथ लोहड़ी का आनंद लिया। मोहद्दीपुर और पैडलेगंज गुरुद्वारे के समीप अरदास के बाद सामूहिक लोहड़ी जलाई गई।
मोहद्दीपुर गुरुद्वारे के सामने रात आठ बजे लोग लोहड़ी मनाने के लिए जुटे। हजूरी रागी भाई रसपाल सिंह ने अरदास की। इसके बाद लोहड़ी जलाई गई। इस दौरान मूंगफली, रेवड़ी, गुड़, छुहारा, मक्का से तैयार प्रसाद लोहड़ी को समर्पित किया। एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और गीत गाए। महानगर के बैंक रोड, राप्तीनगर, सूरजकुंड, रेलवे कॉलोनी, शाहपुर स्थित पंजाबी कॉलोनियों में भी उत्साह रहा। वहां भी लोगों ने लोहड़ी जलाई और समुदाय की महिलाएं-पुरुष व बच्चों ने ने जमकर गिद्धा-भंगड़ा किया। इस दौरान मनमोहन सिंह लाडे, अरविंदर सिंह राजन, जयपाल सिंह, हरबंश सिंह चटवाल, रसपाल सिंह आदि मौजूद रहे।
नई बहुओं के लिए यादगार रही लोहड़ी
जिन घरों में नई बहू आई थीं, वहां लोहड़ी का उल्लास बेहद खास दिखा। सुबह से ही ऐसे घरों में लोहड़ी को खास बनाने की तैयारियां जारी रहीं। जिन घरों मेें बहू आई होती हैं, या बच्चा पैदा होता है, वहां काफी धूमधाम से लोहड़ी मनाने की परंपरा है।
सुधार के संकल्प का पर्व
पर्व से जुड़ी मान्यता के मुताबिक इस दिन एक डाकू ने लड़की की मदद की ठानी और वह कर दिखाया। लोहड़ी देश और समाज के लिए कुछ ऐसा ही बेहतर करने के संकल्प का पर्व है।