नवरात्र व्रत रखने वाले लाल बाबू को रमजान के चांद का भी इंतजार होता है। उनके परिवार में होली-दीवाली पर जैसा उत्साह होता है वैसा ही चांद रात और ईद के लिए भी नजर आता है। शहर के जगन्नाथपुर का यह परिवार सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है और इसके मुखिया लाल बाबू कौमी एकता की विरासत के ‘लाल’ हैं।
पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए व्यापारी लाल बाबू 30 साल से रोजा रखते आ रहे हैं। गंगा-जमुनी तहजीब उन्हें पिता गंगा से विरासत में मिली है। उन्होंने भी 34 साल रोजे रखे थे। लाल बाबू के रोजे में परिवार पूरा साथ देता है। पत्नी गीतांजलि सहरी और इफ्तारी की तैयारी करती हैं तो बेटा करन, बेटी सदाक्षी और आराध्या दस्तरख्वान पर लाल बाबू का साथ देते हैं। शुरुआत के नौ रोजे तक ऐसा ही चलता है। इसके बाद अलविदा की सुबह फिर सहरी की सुगंध इस घर की देहरी के भीतर फैलती है, जो शाम को इफ्तार की खुशबू से तर हो जाती है। इसके साथ ही ईद की खुशियां इस घर में छा जाती हैं और रसोई भाईचारे की सेवईं से महक उठती है।
पिता की मन्नत से शुरू हुआ सिलसिला
बात 1950 की है। परिवार के गुजर-बसर के लिए स्वर्गीय गंगा ने रमजान में एक दुकान की मन्नत मांगी। तय किया कि अगर दुकान हो गई तो वह हर रमजान में 10 रोजे रखेंगे। मन्नत पूरी हुई तो उन्होंने रमजान में रोजे रखने शुरू कर दिए। 1985 तक उन्होंने लगातार रोजे रखे। 1986 में उनका देहांत हुआ तो उनके बेटे लाल बाबू ने पिता की मन्नत सिर-माथे पर ले ली।