गोरखपुर पहुंचा लद्दाख से सिकंदर के वंशज होने का दावा करने वाले आठ लोगों का दल?
लद्दाख के दाहनुस गांव से आठ लोगों का दल सोमवार को एक कार्यक्रम के सिलसिले में जीएन नेशनल स्कूल गोरखपुर पहुंचा है। मूलरूप से यूनानी सम्राट सिकंदर के सेनापति मकस्पून के ये वंशज आर्यन की मूल प्रजाति से हैं। दाहहनु दो गांवों दाह और हनु का सामूहिक नाम है। वास्तव में यह पांच गांवों का समूह है, जो लद्दाख में भारत-पाक सीमा के निकट स्थित है।
अमर उजाला से बातचीत में श्रींग लामचुंग, ताशी पाल्दन, जल्सन दोर्जे, श्रींग डडूल, श्रींग दोर्जे, ताशी डोल्कर, पद्या आंगमो और श्रींग डोल्कर ने बताया कि सदियों पहले जब विश्व विजयी सिकंदर भारत आया तो उसने सिंधु के आसपास के सारे क्षेत्रों को जीत लिया।
वापस अपने देश ग्रीक जाने के पूर्व सिंधु नदी से व्यास नदी तक अपने राज्य का विस्तार किया। महान सिकंदर जब अपने देश ग्रीक लौटा तब अपने पीछे कुछ लोगों को यहीं छोड़ गया। इन निवासियों के खून का संबंध जर्मनी के निवासियों से हैं। आर्य लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि और खुबानी उत्पादन है। किसान पशुपालक भी है, ये गाय, बकरी और याक पालते हैं।
आर्य लोग फसल की बुवाई को एक उत्सव के रूप में मनाते हैं जिसे ‘बोनाना’ के नाम से जाना जाता है। इस उत्सव में ये देवताओं की वेशभूषा में पारंपरिक नृत्य करते हैं। दाहहनु में पर्यटन के बढ़ाने के उद्देश्य से ‘नोकपा’ भाषा उत्सव का आयोजन भी किया जाता है।
लद्दाख में हैं पांचों गांव
उन्होंने बताया कि दुनिया में आर्यों की मूल प्रजाति के मात्र 4000 लोग ही बचे हैं। यह भी माना जाता है कि ये महान सिकंदर के वंशज हैं जो एकांत जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बाहरी दुनिया से बहुत संपर्क नहीं रखते। ये मूलरूप से सांत गांवों में बसे हैं। इनमें से पांच दारचिक, गोरकोन, दाह, बीमा और हानू भारत में है। जबकि दो गांव पाकिस्तान में है।