उत्तर प्रदेश खादी और ग्रामोद्योग विभाग की ओर से टाउनहाल में शुरू हुए 15 दिवसीय खादी महोत्सव का नगर विधायक डॉ. आरएमडी अग्रवाल ने फीता काटकर उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि खादी के प्रति लोगों की सोच बदली है, अब हर वर्ग इसके प्रति अपना रुझान दिखा रहा है। केंद्र और प्रदेश सरकार खादी और ग्रामोद्योग को बढ़ावा देने के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रही है।
उप मुख्य कार्यपालक अधिकारी जीके त्रिवेदी ने पंडित दीनदयाल ग्रामोद्योग रोजगार योजना की जानकारी दी। महोत्सव की हर शाम 6 से 9 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गुलजार रहेगी। यहां लगे स्टॉल में बंगाल एवं असम की सिल्क, टसर, कांथा, बालूचेरी साड़िया, खादी और रेशम के रेडीमेड शर्ट, कुर्ता पायजामा, सदरी, शॉल, ऊनी वस्त्र, कंबल, आगरा और कानपुर का चमड़ा उत्पाद, बीकानेर की नमकीन और पापड़, प्रतापगढ़ के आंवला उत्पाद, हर्बल उत्पाद, शहद, अगरबत्ती, धूपबत्ती, बैग तथा उत्तराखंड के उत्पाद शामिल हैं। इस दौरान खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के योजनाधिकारी प्रचार प्रसार ललित कुमार सक्सेना, जिला ग्रामोद्योग अधिकारी महेंद्र यादव, अनिल रामेंद्र मिश्र आदि मौजूद थे।
लोगों को भा रहे कश्मीरी पशमीना शॉल
एक ओर रामधुन बापू की याद दिला रही थी तो दूसरी ओर खादी उनकी सीख की। सूत कातने के लिए आधुनिक चरखा लोगों को लुभा रहा था तो वहीं लकड़ी का परंपरागत चरखा पुराने दौर की याद दिला रहा था। यहां न सिर्फ खादी की विकास यात्रा को समझाने वाले साज-ओ-सामान दिखे, बल्कि खादी एवं ग्रामोद्योग से जुड़े एक से बढ़कर एक लुभावने उत्पाद भी मिले। चारों तरफ लगे स्टॉल देश की विविधतापूर्ण संस्कृति और कारीगरी का हुनर दिखा रही थी।
टाउनहाल में मंगलवार से शुरू हुए खादी महोत्सव की रंगत कुछ ऐसी ही दिखी। पहले दिन कश्मीर के गर्म कपड़ों और ड्राई फ्रूट के स्टॉल पर शहरवासियों की अच्छी तादाद जुटी। अनंतनाग के शाहबाद खादी ग्रामोद्योग की ओर से लगे स्टॉल पर मौजूद कोट, शॉल, सूट, स्वेटर, जैकेट, कंबल, रजाई, पशमीना शॉल लोगों को भा रहे हैं। इनकी रेंज 400-5000 रुपयों के बीच है। खरीदारों को लुभाने के लिए 30 फीसदी की छूट भी दी जा रही है। स्टॉल के संचालक सब्बीर अहमद ने बताया कि लाइट वेट, गर्म होने के साथ ही खास कारीगरी पशमीना शॉल को अन्य शॉलों से अलग बनाती है। इनकी कीमत डेढ़ लाख रुपये तक होती है। इसे तैयार करने में ही 80 हजार रुपये तक का खर्च आता है। ज्यादा महंगा होने के कारण ही इसे डिमांड पर तैयार किया जाता है। महोत्सव में शहरवासियों के लिए सेमी पशमीना शॉल की बेहतरीन रेंज है। इनके अलावा प्रदर्शनी में बंगाल, असम की सिल्क के साथ कानपुरी चमड़े के उत्पाद, बीकानेर की नमकीन और पापड़ का स्वाद भी लोगों को मिल रहा है।
खास है लेह-लद्दाख की हींग और कश्मीर की खुबानी
महोत्सव में कश्मीर के ड्राई फ्रूट के स्टॉल पर खुबानी (एप्रीकॉट) और लेह-लद्दाख की हींग भी अपनी खुशबू बिखेर रही है। मो. अर्शीद ने बताया कि खुबानी के अनेकों लाभ हैं। इसका न सिर्फ फल, बल्कि बीज भी इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में सहायक होता है। ये आसानी से किसी ड्राईफ्रूट की दुकान पर नहीं मिलते हैं, मगर खादी महोत्सव से शहरवासी इसे आसानी से खरीद सकते हैं। इसकी कीमत 800 रुपये किलो है।
... मोरे चरखा के टूटे ना तार
खादी महोत्सव के अंतर्गत देर शाम सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया। लोकगायकों ने गीतों ने फिजा में भोजपुरी की मिठास घोल दी। राकेश श्रीवास्तव ने ‘...मोरे चरखा के टूटे ना तार’ गीत पेश कर माहौल को ऊंचाई प्रदान की। वहीं राकेश ने कबीर दास का ‘निर्गुण ओ जरा धीरे-धीरे गाड़ी हांको, मोरो राम गाड़ीवान’ गीत पेशकर शहरवासियों को भक्तिरस में डूबो दिया। भोजपुरी गीतों के क्रम में ‘...प्रीत में ना धोखाधड़ी, प्यार में ना झांसा, ...कोई गोदवाई हो गोदनवां, सांझ बोले चिरई’ गीतों की प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अनन्या सिंह ने लोकगीतों से खादी का महत्व बताया। वाद्य यंत्रों पर जलज उपाध्याय, मुकेश वर्मा, किशोर गुप्ता, रवींद्र और विजय मिश्र ने साथ दिया। इस अवसर पर भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ इंडिया के संरक्षक डॉ. रूप कुमार बनर्जी, शिवेंद्र पांडेय, राकेश मोहन, योगेंद्र चौधरी आदि मौजूद थे।