गोरखपुर यूनिवर्सिटी से जुड़े ऐसे 22 कॉलेजों के प्रबंध कमेटी की पड़ताल शासन ने शुरू कर दी है, जिनकी संबद्धता पर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इसलिए रोक लगा दी थी कि उनकी कमेटी में सगे रिश्तेदारों को शामिल किया गया है। शासन के बुलावे पर यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार और कॉलेज प्रबंधन के लोग उच्च शिक्षा सचिवालय पहुंचे और अपना-अपना पक्ष रखा। विशेष सचिव की मौजूदगी में दोनों पक्ष का बयान दर्ज हुआ। अंतिम फैसला प्रमुख सचिव लेंगे।
बिना एनओसी के एनसीटीई से बीएड की मान्यता हासिल करने वाले कॉलेजों की जांच के दौरान तत्कालीन रजिस्ट्रार प्रभाष द्विवेदी ने 22 कॉलेजों की प्रबंध समिति में सगे रिश्तेदारों के नाम की तस्दीक कर ली। रजिस्ट्रार ने इसे नियम विरुद्ध तो माना ही, साथ ही जानबूझ कर किया अपराध करार देते हुए तत्काल उन कॉलेजों की संबद्धता पर रोक लगा दी। यही नहीं, इसकी समूची जानकारी शासन और राजभवन को भी दे दी। रजिस्ट्रार के निर्णय से परेशान कॉलेज प्रबंधन ने इसे लेकर शासन में अपील की।
कॉलेज प्रबंधन का कहना था कि नियम की जानकारी न होने से यह गलती हुई है, उन्हें एक मौका मिलना चाहिए। स्थिति की पड़ताल करने के बाद शासन ने बृहस्पतिवार व शुक्रवार को दोनों पक्षों को सुनवाई के लिए लखनऊ बुलाया। वहां विशेष सचिव मधु जोशी ने दोनों पक्षों से पूछताछ की। सूत्रों की मानें तो पूछताछ के दौरान शासन का रुझान कॉलेजों के पक्ष में दिखा।
शासन का मानना था कि चूंकि इस तरह का पहला मामला यूनिवर्सिटी के संज्ञान में आया था, इसलिए कॉलेजों को प्रबंध समिति में बदलाव का एक मौका यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से जरूर मिलना चाहिए था। फिलहाल पूछताछ की प्रक्रिया पूरी हो गई है, अब प्रबंधन को शासन के फैसले का इंतजार है।
खाते से मानदेय भुगतान की नसीहत
प्रबंध कमेटी से पूछताछ के दौरान विशेष सचिव के सामने यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कॉलेजों द्वारा शिक्षकों को खाते में भुगतान न करने का मुद्दा भी उठाया। इस पर शासन का रुख कड़ा रहा। विशेष सचिव ने साफ तौर पर कॉलेजों से कहा कि वे शिक्षकों का भुगतान हर हाल में खाते के माध्यम से ही करें। तीन साल कक्षा संचालन के बाद स्थायी मान्यता की मांग करने वाले कॉलेजों के लिए खाता भुगतान अनिवार्य करने पर उन्होंने जोर दिया।