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वाटर पार्क के साझेदारों को हाईकोर्ट से भी झटका, नहीं माना याचिका को सुनवाई योग्य

Sat, 26 Oct 2019 01:48 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर
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Allahabad High Court
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वाटर पार्क नीर निकुंज में स्थित विवाह घर को सील किए जाने के मामले में पार्क के साझेदारों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से भी कोई राहत नहीं मिली। कमिश्नर द्वारा खारिज की गई अपील के खिलाफ साझेदारों की तरफ से दाखिल याचिका को कोर्ट ने सुनवाई योग्य (पोषणीय) नहीं बताया।

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इसके बाद याचिका खारिज न हो इसलिए साझेदारों के अधिवक्ता ने अनुरोध कर खुद ही याचिका वापस ले ली। अब वाटर पार्क के साझेदार सक्षम प्राधिकारी यानी कमिश्नर या शासन में अपनी बात रख सकेंगे।

जीडीए की तरफ से पार्क में स्थित विवाह घर को सील किए जाने के बाद साझेदारों ने कमिश्नर कोर्ट में अपील दाखिल की थी। पांच अक्तूबर 2019 को सुनवाई के दौरान कमिश्नर ने जीडीए की कार्रवाई को सही बताते हुए साझेदारों की अपील खारिज कर दी।
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कमिश्नर के इस फैसले के खिलाफ ही साझेदारों ने 292 पन्नों में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। प्राधिकरण के मुताबिक इस याचिका में साझेदारों ने सचिव राम सिंह गौतम पर भी कई गंभीर आरोप लगाए थे।

सील तोड़ने पर दर्ज हो चुकी है साझेदारों पर एफआईआर
विवाह घर सील होने के बाद भी उसे संचालित करने पर प्राधिकरण ने वाटर पार्क के साझेदारों के खिलाफ मार्च 2019 में मुकदमा दर्ज करा रखा है। हालांकि साझेदारों की तरफ से हाईकोर्ट में दाखिल याचिका पर कोर्ट ने अभी उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाई है। साथ ही कोर्ट ने जीडीए को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया था। प्राधिकरण का अभी इस मामले में अपना पक्ष रखना बाकी है।

जीडीए के मुताबिक 28 अक्तूबर 2005 को पार्क को लेकर जीडीए से हुई अनुबंध की शर्तों का साझेदारों ने उल्लंघन किया है। पार्क जीडीए की संपत्ति है। इसका संचालन करने वालों का अस्तित्व सिर्फ कस्टोडियन के रूप में है। करार का उद्देश्य पार्क का समुचित रखरखाव, वाटर पार्क एवं एन्वायरमेंटल पार्क को विकसित करना था। मगर अनुबंध की शर्तें तोड़कर वहां विवाह घर संचालित किया जा रहा था। इसपर 22 फ रवरी को सीलबंदी की कार्रवाई की गई।

सीलबंदी को लेकर कमिश्नर कोर्ट से हुए फैसले के खिलाफ पार्क के साझेदारों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। 24 अक्तूबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य नहीं पाया। अनुरोध कर उनके अधिवक्ता ने खुद ही याचिका वापस ले ली। अब वे कमिश्नर या शासन के समक्ष अपनी बात रख सकते हैं।
- राम सिंह गौतम, सचिव, जीडीए
जीडीए सचिव जानबूझकर मेरा उत्पीड़न कर रहे हैं। उनके खिलाफ रुपये मांगने समेत कई गंभीर आरोपों में मैनें एफआईआर दर्ज कराने के लिए खोराबार थाने में तहरीर दे रखी है। अगर वहां मुकदमा नहीं दर्ज हुआ तो मैं कोर्ट की शरण में जाऊंगा। हाईकोर्ट में दाखिल की गई याचिका में भी इसका जिक्र किया गया। सचिव ने कोर्ट में कुछ नोटिस का जिक्र किया, जिसकी मुझे जानकारी नहीं है। इसलिए हमने पहले कमिश्नर कोर्ट में फिर जरूरत पड़ने पर शासन में अपना पक्ष रखने का निर्णय किया। इसके बाद जरूरत पड़ने पर फिर कोर्ट जाएंगे।
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- दीपक अग्रवाल, साझेदार, नीर निकुंज

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