फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राजभवन और सचिवालय तक पहुंचेगा सच

Wed, 25 May 2016 08:10 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
विज्ञापन
गोरखपुर यूनिवर्सिटी
विज्ञापन
गोरखपुर यूनिवर्सिटी से मान्यता हासिल करने के लिए फर्जीवाड़ा किया जाना संबंधित कॉलेजों को आने वाले समय में और भारी पड़ने वाला है। यूनिवर्सिटी से दागी घोषित हो चुके इन कॉलेजों को अब शासन और राजभवन में अपनी पैरवी करने में खासी मुश्किलें आएंगी। इन मुश्किलों की जमीन यूनिवर्सिटी प्रशासन तैयार कर रहा है।
विज्ञापन


इससे पहले कि कॉलेज अपना पक्ष राज्यपाल या प्रमुख सचिव के सामने रखे, यूनिवर्सिटी पूरे प्रकरण से राजभवन और सचिवालय को रूबरू कराने जा रही है। इसके लिए पिछले दिनों हुए फर्जीवाड़े की सिलसिलेवार फाइल तैयार करने का काम शुरू हो गया है। इसके  पीछे यूनिवर्सिटी की मंशा यह है कि फर्जीवाड़ा प्रकरण को कॉलेज प्रशासन बदले स्वरूप में राजभवन और शासन न प्रस्तुत कर सके और दोषियों पर कार्रवाई की प्रक्रिया थमने न पाए।

दरअसल पिछले दिनों मान्यता हासिल करने के लिए फर्जीवाड़े के दो बड़े प्रकरणों के प्रकाश में आने से यूनिवर्सिटी की समूची संबद्धता प्रणाली पर ही सवाल उठने लगा है। पहले एनओसी और शिक्षक अनुमोदन में फर्जीवाड़ा कर एनसीटीई से बीएड की मान्यता हासिल करने का मामला सामने आया, जिसमें एनसीटीई ने 11 कॉलेजों को दोषी करार दिया तो यूनिवर्सिटी ने सभी को दोषी बता दिया। अभी यह मामला गरम ही था कि इसी बीच रजिस्ट्रार ने 22 कॉलेजों का प्रबंध समिति में घालमेल पकड़ लिया। इन प्रबंध समितियों में नियम को ताक पर रखकर खास रिश्तेदारों को स्थान दिया गया है, साथ ही यह ऐसा न किए जाने का शपथ-पत्र भी दाखिल कर दिया था।  
विज्ञापन


रजिस्ट्रार का तबादला कार्रवाई की वजह तो नहीं
गोरखपुर। वर्तमान रजिस्ट्रार प्रभाष द्विवेदी का तबादला पिछले दिनों संस्कृति यूनिवर्सिटी, वाराणसी के लिए हो गया। नई तैनाती अशोक कुमार अरविंद को दी गई, जिनके जाने के बाद ही प्रभाष द्विवेदी को तैनात किया गया था। महज पांच महीने में रजिस्ट्रार के तबादले की वजह पर सवाल उठने लगे। इस बात की भी चर्चा है रजिस्ट्रार की सख्ती रसूखदार कॉलेज प्रबंधकों को नागवार गुजरी और उन्होंने तबादला करा दिया। 

हर बार यूनिवर्सिटी अपने फैसले से राजभवन और शासन को तत्काल अवगत नहीं कराती थी, ऐसे में कॉलेजों को अवसर मिल जाता था कि वे वहां अपनी बात को तोर-मरोड़ कर पेश कर देते थे, जिससे प्रकरण उलझ जाता था। इसी से बचने के लिए इस बार रिपोर्ट को पहले ही भेजने का निर्णय लिया गया है। 
विज्ञापन

- प्रभाष द्विवेदी, रजिस्ट्रार, गोरखपुर यूनिवर्सिटी
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें