एक तरफ ठंड परवान पर थी तो दूसरी तरफ शबनम हर किसी को भिगोने की जिद में। फिर भी इतवार की देर रात तक शायरी के कद्रदान पूरी मुस्तैदी से जमे रहे। शायरी की गरमाहट का उन्हें सहारा जो था। ज्यों-ज्यों रात बढ़ी, शायरी की गर्मी भी अपने रौ में आ गई। एक के बाद एक नामचीन शायर और कवि मंच पर आते गए और समां बंधता गया।
मुशायरे और कवि सम्मेलन की निजामत कर रहे अनवर जलालपुरी की गंभीर आवाज जब लोगों तक पहुंची तो सभी ने उनका पूरी शिद्दत से उनका खैर मकदम किया। जलालपुरी ने जब ‘ये सर्द रात ये आवारगी और ये नींद का बोझ, अपने शहर में होते तो घर चले जाते...’ सुनाकर श्रोताओं से संवाद साधा तो लोग उनसे जुड़ते चले गए। फिराक की धरती को सलाम करने के बाद उन्होंने शुरू किया कवियों और शायरों का आवाज देना। सिलसिला अना देहलवी के मां शारदा वंदन से शुरू हुआ। मंच की पहली रचना पढ़ने की जिम्मेदारी कवि प्रमोद तिवारी को सौंपी गई। प्रमोद ने अपनी मशहूर कविता ‘राहों में रिश्ते बन जाते हैं...’ से लोगों को खुद से जोड़ने की कोशिश की तो उसके बाद मंच पर आए अलताफ जिया ने जब जिंदगी की उलझनों को अपनी गज़ल से उकेरा तो लोग उस दर्द को खुद में तलाशने की कोशिश करने लगे।
हास्य और व्यंग के बीच जीवन की सच्चाई बयां करने के हुनरमंद अशोक चक्रधर को जब जलालपुरी ने मंच पर आमंत्रित किया तो उन्हें सुनने के लिए मुशायरे में पहुंचे लोगों की निगाहें मंच की ओर टिक गईं। वो भी लोगों की ख्वाहिश पूरा करने के लिए संजीदा थे। असहिष्णुता को लेकर देश भर में छिड़ी बहस को जब उन्होंने अपनी रचना धर्म के नाम पर कत्ले आम, राम राम राम... सुनाई तो शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने उसपर दाद नहीं दी। प्यार में दुश्मन होता है अहंकार... से वे युवाओं को संदेश देना भी नहीं भूले।
मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने वो मेरे चेहरे तक अपनी नफरतें लाया तो मैंने उसके हाथ चूमे और बेबस कर दिया सुनाकर... प्रेम और सद्भाव की राह दिखाई। उसके बाद तो महफिल पूरे रंग में आ गई। शायर के शायर निदा फाज़ली, नसीम निकहत, सुनील तंग, संदीप शर्मा, कलीम कैसर, अनामिका अंबर जैसे कवि व शायरों ने देर रात तक लोगों को मुशायरे में जमे रहने के लिए मजबूर किया। मुशायरे की सदारत शायर वसीम बरेलवी ने की।