गज़ल और भजन जैसी गायन की दो मशहूर विधाओं से कभी लोगों की दिनचर्या में शामिल हो जाने वाले अनूप जलोटा शुक्रवार को गोरखपुर महोत्सव में शामिल होने के लिए शहर में थे। महोत्सव में अपनी प्रस्तुति से पहले वे संवाददाताओं से मुखातिब हुए और गीत-संगीत को लेकर अपनी भावना और भविष्य की योजनाओं को साझा किया। प्रस्तुत है बातचीत के महत्वपूर्ण अंश।
सवाल : गज़ल और भजन गायन दोनों विधाओं में शास्त्रीयता का गहरा पुट है और आपने दोनों को ही साधा है। किस विधा में आपको ज्यादा सुकून मिलता है?
जवाब : भजन में। दरअसल भजन शास्त्रीयता के पेड़ की टहनी है। यही वजह है कि पं. ओंकार नाथ ठाकुर, पं. जसराज, किशोरी अमोनकर जैसे शास्त्रीय गायक भजन को अपने कार्यक्रमों का हिस्सा जरूर बनाते हैं।
सवाल : जिस दौर में आपने गज़ल गायकी शुरू की, उसमें गज़ल के कद्रदानों की बड़ी तादाद थी। आज गज़ल सुनने वाले इक्के-दुक्के ही मिलते हैं इसे आप किस नजरिये से देखते हैं?
जवाब : भाषा की समझ का संकट। आज लोगों को हिंदी ठीक से नहीं आती तो उर्दू समझने की उम्मीद ही नहीं कर सकते। इसका सीधा असर गज़ल सुनने वालों की तादाद पर पड़ा।
सवाल : समाज में धार्मिकता का दायरा तेजी से बढ़ा है, इसमें भजनों की भूमिका आप कहां तय करते हैं?
जवाब : भजन के माध्यम से हम लोगों को अच्छा सोचने का तरीका बताते हैं। धर्म का दायरा बढ़ाने की हमारी कोई मंशा नहीं होती।
सवाल : आपका पसंदीदा भजन कौन सा है और क्यों?
जवाब : दरअसल ‘राग तोड़ी’ मेरी पंसदीदा राग है। ऐसे में जिन भजनों और गज़लों में मैंने इनका प्रयोग किया है, वह ज्यादा पसंद हैं। इस हिसाब से जग में सुंदर हैं दो नाम.. कभी कभी भगवान को... भजन और तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना है.. गज़ल मुझे ज्यादा पसंद है।
सवाल : भजन गायन के क्षेत्र में क्या नया प्रयोग कर रहे हैं आप?
जवाब : वेदों को रिकॉर्ड करने की योजना बनाई थी। कुछ ऋचाएं रिकॉर्ड भी कीं लेकिन उस रिकॉर्डिंग को परंपरागत धुन से नहीं निकाल सका। इसलिए काम रोक दिया। अब ऋचाओं को नए ढंग से पेश करने के लिए काम कर रहा हूं।
सवाल : प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य के रूप में क्या खास कर रहे हैं।
जवाब : अब तक अफसरों के हाथ में यह जिम्मेदारी होती थी, पहली बार कलाकारों को सौंपी गई है, जिसका असर बहुत जल्द रेडियो ओर दूरदर्शन के सभी कार्यक्रमों में देखनेे को मिलेगा। दूरदर्शन से जल्द एक संगीत चैनल शुरू करने की योजना है।