यूनिवर्सिटी के दीक्षा भवन में वोट डालने पहुंचीं छात्राएं।
- फोटो : Shivharsh Dwivedi
यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में पहली दफा छात्राएं मुखर दिखीं। मतदान को लेकर उत्साह तो था ही चुनाव के प्रचार की कमान भी उनके हाथ में थी। इसका असर मतदान के ग्राफ में भी दिखा। कभी 25 से 30 फीसदी ही लड़कियां मतदान करती थीं, लेकिन इस बार यह आंकड़ा 40 फीसदी पहुंच गया। बदलाव की यह बयार अनायास नहीं है। यह बदलती सोच का नजरिया भी है।
छात्रसंघ चुनाव में समय-समय पर छात्राओं ने नेतृत्व की कमान भी संभाली। 70 के दशक में उपाध्यक्ष पद पर जब मीरा कुमारी चुनी गईं तो राजनीति में यह नया बदलाव था। हालांकि इसके बाद कई छात्राओं ने किस्मत आजमाई लेकिन सफल नहीं हुईं। वर्ष 2005 में चेतना पांडेय ने न सिर्फ उपाध्यक्ष पद पर कब्जा जमाया बल्कि उस दौरान छात्राओं के बढ़े वोट प्रतिशत में भी अहम भूमिका उनकी रही, लेकिन उस वक्त भी मतदान प्रतिशत 30 फीसदी से कम था। इसके पहले तक छात्राओं का छात्रसंघ चुनाव में रुझान न के बराबर होता था। वोट देने के लिए प्रत्याशियों को उनके घर तक गाड़ी की व्यवस्था करनी पड़ती थी। इस बार कुल 6199 छात्राएं वोटर थीं और 2522 ने मतदान किया। यानी करीब 40 फीसदी छात्राएं लोकतंत्र के इस पर्व में शामिल हुईं।
10 साल बाद इस बार महामंत्री पद पर ऋचा चौधरी ने किस्मत आजमाई है। उनके आने से वोट प्रतिशत भी बढ़ा, लेकिन जिस तरह सुबह से ही वोट डालने के लिए लड़कियां आती रहीं, यह आश्चर्य के साथ बदलते दौर का सूचक भी रहा। चुनाव को लेकर उनमें न तो कोई भय दिखा और न ही पहली बार वोट डालते समय घबराहट। वोट डालकर लौट रहीं बीएससी द्वितीय वर्ष की तीन छात्राएं तो इसे लेकर परेशान नजर आईं कि उनके ग्रुप की 10 में से एक लड़की अभी तक वोट डालने नहीं आई। इसी तरह काफी देर तक गेट पर खड़े होकर आरती अपनी सहेली का इंतजार करती रहीं। विद्यार्थी राजनीति में छात्राओं की बढ़ती भागीदारी बदलाव का संकेत भी है।