गोरखनाथ मंदिर में राम कथा के चौथे दिन कथा मर्मज्ञ मोरारी बापू ने कहा कि तीन वस्तुयें वाणी, पानी (जल), कर्माणी (आय) को कभी मत बिगाड़ना। आय का दशांश दान में देने से आय शुद्ध होती है। व्यासपीठ का उद्देश्य किसी को सुधारना नहीं बल्कि भक्त जैसा है, जिस रूप में है उसे उस रूप में स्वीकार करना है।
बापू ने कथा को विस्तारित करते हुए कहा कि मानव मात्र को कभी अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि जल से भरे एक घड़े में हम एक-एक कर के पत्थर डालते जाते है तो धीरे-धीरे वह घड़ा कंकड़ से भर जाता है तथा जल से रिक्त हो जाता है।
वैसे ही यदि हम अपने शरीर रूपी घड़े में, अंधकार रूपी कंकड़ ज्यादा डालेंगे तो हमारा शरीर शीलगुण रूपी पानी से रिक्त हो जायेगा। बापू ने बताया कि भगवत कथा की अर्थात मानसे की केवल एक चैपाई भी पूरी तरह से टूट चुके जीण-शीर्ण हो चुके मनुष्य को पुनः उसके वास्तविक स्वरूप जैसा पवित्र कर देती है।
बापू ने विजयदशमी की बधाई के साथ ही पार्वती विवाह के बाद श्रीराम जन्म कथा का वर्णन किया। खुशी से उनकी आंखो से जलधारा बरस पड़ी। इस प्रकार गोरखनाथ के पावन धरा पर विजयदशमी के दिन दशरथ नन्दन श्रीराम का जन्म हुआ। बापू ने व्यासपीठ से सभी श्रद्धालुओं को बधाई देते हुए चर्तुथ दिवस की कथा को विश्राम दिया।