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रेलवे स्टेशन पर नवजात को लावारिस छोड़ने वाले अज्ञात मां-बाप के खिलाफ केस दर्ज

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रेलवे स्टेशन पर नवजात को लावारिस छोड़ने वाले अज्ञात मां-बाप के खिलाफ केस दर्ज
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गोरखपुर। गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर पांच दिन पहले लावारिस हाल में फेंके गए बालक शिशु के मामले में जीआरपी ने आखिर मंगलवार को मामला दर्ज कर लिया। भारतीय दंड संहिता की धारा 317 (12 वर्ष तक के बच्चे का परित्याग कर जीवन खतरे में डालना) के तहत गोरखपुर में संभवत: यह पहला मामला दर्ज हुआ है। इस मामले में वादी की रट लगाए जीआरपी को दीवानी कचहरी के अधिवक्ता अभिनव त्रिपाठी की तहरीर दी थी। अभी तक इस मामले में पुलिस बच्चे की बरामदगी का ब्यौरा रोजनामचे में दर्ज करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती थी। अब इस मामले में पुलिस को अनुसंधान करना होगा। फिलहाल, बच्चे को जंगल एकला के बाल संरक्षण गृह में रखा गया है।
इस मुकदमे का दर्ज होना इस मायने में अहम है कि अगर मामले दर्ज होते रहे और पुलिस ने ठीक से अनुसंधान किया तो ऐसे अभिभावक जेल के सीखचों के पीछें होंगे, जो नवजात को मरने के लिए फेंक जाते हैं। प्रावधान होने के बावजूद पुलिस इस कानूनी व्यवस्था की अनदेखी कर रही थी। इसका फायदा उन दंपतियों को मिल रहा था, जो लिंगभेद या अन्य कारणों से नवजात को मरने के लिए कहीं भी फेंक जाते थे। ऐसे ही किसी हृदयहीन मां-बाप ने बृहस्पतिवार को रेलवे स्टेशन पर कपड़े में लपेटकर एक बच्चा छोड़ दिया था। रोने की आवाज सुनकर यात्रियों ने देखा और फिर आरपीएफ, यात्री मित्र कार्यालय के लोगों ने चाइल्ड लाइन पहुंचाया था। चाइल्ड लाइन की टीम ने उसका औपचारिक डॉक्टरी जांच भी कराई थी तो पता चला कि उसके आंख रोशनी नहीं है। स्वस्थ होने के बाद उसे बाल संरक्षण गृह में रखा गया है।
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वादी ना होने की दलील देकर नहीं दर्ज करते केस
पुलिस इस मामले में पिछले पांच दिनों से वादी ना होने का हवाला देकर दबाने की कोशिश कर रही थी। इतना ही नहीं पहले तो कानून की जानकारी से ही इंकार कर दिया था अब वादी के सामने आने पर केस दर्ज कर जीआरपी ने जांच शुरू की है।
जिनकी जिम्मेदारी वही बेखबर, नियम ही नहीं जानते
नवजात बच्चे के फेंके जाने के मामले में जिसे तहरीर देना चाहिए वही इस कानून को नहीं जानते हैं। वादी ना बनने के सवाल पर जिला प्रोबेशन अधिकारी सर्वजीत सिंह का जवाब हैरान करने वाला है। कहा कि, अभी उनकी नई तैनाती हैं, मुकदमा दर्ज करने का नियम नहीं जानते हैं। विधिक सलाह लेने के बाद ही कुछ बता पाएंगे। जबकि किसी भी नवजात फेंके गए बच्चे के मिलने पर प्रोबेशन अधिकारी के दिशा निर्देश पर ही गठित पांच सदस्यीय कमेटी बच्चे का रख रखाव करती है। ऐसे में अधिकारी का वादी बन दोषी माता पिता के खिलाफ संबंधित धाराओं में तहरीर न देना, हैरत करता है।
सात साल तक की सजा हो सकती है
आईपीसी की धारा 317 किसी शिशु के पिता या माता या उसकी देखरेख रखने वाले व्यक्ति द्वारा 12 वर्ष या उससे कम आयु के शिशु का परित्याग और असुरक्षित डाल देने या छोड़ देने से संबंधित है। ऐसा करने वाले को सात साल तक की जेल या आर्थिक दंड अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है। यह प्रथम श्रेणी के न्याधीश द्वारा विचारणीय है।
अमर उजाला के 18 सितंबर के संस्करण में नवजात बच्चे को फेंके जाने की खबर पढ़ी थी। इसके बाद मन द्रवित हो गया था। अजीब सी बेचैनी थी कि कोई अभिभावक ऐसा कैसे कर सकता है ? अगर लालन-पालन में अभिभावक सक्षम नहीं है तो कई ऐसी सामाजिक संस्थाएं हैं जो बच्चों को गोद लेती हैं, उन्हें सौंपने की जगह खुद के बच्चे को मरने के लिए छोड़ देना मन को कचोट रहा था। कई दिन तक अखबार पढ़ा तो वादी की वजह से केस दर्ज ना होने का मामले की जानकारी हुई। इस वजह से मैंने फैसला कि ऐसे दोषी मां-बाप को मैं सजा दिलाऊंगा, इसी वजह से तहरीर देकर केस दर्ज करा दिया। लोगों को ऐसे मामलों में आगे आना चाहिए।
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अभिनव त्रिपाठी, अधिवक्ता दीवानी कचहरी
बच्चा फेंके जाने के मामले में तहरीर मिलने के आधार पर संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। अब साक्ष्य जुटाए जाएंगे। रेलवे स्टेशन के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज भी खंगाले जाएंगे। अज्ञात मां-बाप को ढूंढ निकालने की कोशिश होगी।
अश्विनी कौशिक, प्रभारी निरीक्षक, थाना जीआरपी
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