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प्रेमचंद की प्रतिमा को अनावरण का इंतजार

Sat, 30 Jul 2016 08:39 PM IST
डॉ. राकेश राय, अमर उजाला, गोरखपुर।
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प्रेमचंद पार्क के सामने ढाई से साल से अनावरण का इंतजार में ढकी प्रेमचंद की प्रतिमा। - फोटो : Shivharsh Dwivedi
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शहर के प्र्रेमचंद पार्क के गेट पर स्थापित प्रेमचंद की प्रतिमा को स्थापना के ढाई साल बाद भी अनावरण का इंतजार है। दरअसल 13 मार्च 2014 को तत्कालीन अपर आयुक्त अश्वनी कुमार श्रीवास्तव ने प्रेमचंद साहित्य संस्थान की लाइब्रेरी में मौजूद उनकी ऐतिहासिक प्रतिमा को पार्क के गेट पर स्थापित करा दिया था। सूचना मिलने पर संस्थान के सचिव मनोेज सिंह ने साहित्यकारों व कलाकारों के साथ मिलकर अपर आयुक्त से ऐसा न करने की अपील की तो उन्होंने एक न सुनी।
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इसे लेकर जब संस्थान के लोग कमिश्नर से मिले तो उन्होंने आचार संहिता का हवाला देकर चुनाव बाद सार्थक पहल का आश्वासन दिया। इस बीच प्रतिमा को मामले के निस्तारण तक के लिए ढक दिया गया। चुनाव बाद जब संस्थान के लोगों ने प्रशासन से संपर्क साधा तो जांच की घुट्टी पिला दी गई। तबसे लेकर अब तक दो साल से अधिक का समय हो चुका है लेकिन अब तक न तो इस मामले का निस्तारण हो सका और न ही प्रतिमा का अनावरण। यह प्रतिमा प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी की बनवाई हुई है। प्रेमचंद पीठ को प्रोफेसर की दरकार प्रेमचंद की कृतियों पर शोध की आकांक्षा के साथ 1990 में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में प्रेमचंद पीठ की स्थापना की गई और साहित्यकार प्रो. परमानंद श्रीवास्तव को इसकी कमान सौंपी गई। पांच वर्ष तक यह पीठ कार्यान्वित रहा लेकिन 1995 में प्रो. परमानंद के रिटायर होने पर पीठ की गतिविधियां ठप पड़ गईं। बाद में प्रेमचंद साहित्य संस्थान के निदेशक प्रो. सदानंद शाही और सचिव मनोज कुमार सिंह की मांग पर कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने पीठ को पुनर्जीवित करते हुए खाली पड़े प्रोफेसर के पद को शिक्षक भर्ती के विज्ञापन में शामिल कर दिया। चूंकि अभी शिक्षक भर्ती प्रक्रिया अभी चल रही है, ऐसे में पीठ पुनर्जीवित होने के बावजूद कार्यशील नहीं हो सका है। प्रेमचंद की कालजयी कृतियों से दूर आज का युवा समाज की बारीकियों को अपनी कालजयी कृतियों में बेहद खूबसूरती से पिरोने वाले कथाकार-उपन्यासकार प्रेमचंद के विचारों की प्रासंगिकता से शायद ही कोई इन्कार कर सकता है। दुखद पहलू यह है कि प्रासंगिक होने के बावजूद यह कृतियां नई पीढ़ी तक नहीं पहुंच पा रहीं। अध्ययन के दायरे में आने वाली कहानियों और उपन्यासों को तो नई पीढ़ी जरूरत समझ कर पढ़ ले रही है लेकिन उनकी अन्य मशहूर कृतियों को पढ़ने की ललक इनमें नहीं दिखती। प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर कुछ युवाओं से हुई बातचीत में उनकी कृतियों से बनी दूरी का तथ्य सामने आया। उधर युवा साहित्यकार प्रेमचंद की कृतियों से युवाओं की दूरी पर चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यास से वंचित रहकर नई पीढ़ी जीवन की जमीनी समझ से दूर हो रही है। 
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पढ़ाई से ही वक्त नहीं मिलता
प्रेमचंद की कई कहानियों और उपन्यास की चर्चा अपने पिता से सुनी है। कोर्स के दौरान ‘ईदगाह’ पढ़ने का अवसर भी मिला। पिता की चर्चा और ईदगाह की संवदेनशील पेशगी ने उनकी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए प्रेरित तो किया लेकिन कोर्स की पढ़ाई के बीच वक्त ही नहीं मिला। 
- विनम्र राय, इंजीनियरिंग छात्र

कर्मभूमि से आगे नहीं बढ़ सका
जब भी किसी से उपन्यास की चर्चा सुनी, प्रेमचंद का नाम सबसे पहले सामने आया। बीए करते हुए हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल ‘कर्मभूमि’ को उत्साह से पढ़ा। पढ़ने के बाद प्रण किया कि उनके सारे उपन्यास पढ़ूंगा लेकिन अभी तक कर्मभूमि से आगे नहीं बढ़ सका हूं। 
- इंद्रेश कुमार, छात्र (बीए अंतिम वर्ष)

विज्ञान में ही उलझा रह गया
विज्ञान के छात्र के तौर पर इंटरमीडिएट तक हिंदी की पढ़ाई की और इस दौरान शिक्षकों से प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों का बखान खूब सुना। उनकी बात सुनकर हमेशा इच्छा हुई कि उन रचनाओं को पढ़ूं लेकिन विज्ञान ने वक्त ही नहीं दिया। मौका मिलते ही पढ़ने की कोशिश होगी।
- अर्जुन कुशवाहा, छात्र (बीसीए)
 
रोजगार की कोशिश में छूटे प्रेमचंद
इंटरमीडिएट करने के साथ ही रोजगार की चिंता सताने लगी। इस फेर में प्रेमचंद की ईदगाह, पूस की रात, कफन जैसी कहानी सामने पड़ी तो पढ़ डाली लेकिन किसी अन्य रचना से जुड़ने की इच्छा रोजगार की इच्छा में दफन हो गई। अब वह इच्छा पूरी होगी या नहीं, कह नहीं सकता।
- संदीप सिंह, प्राइवेट कर्मचारी 

समाजिक समझ के लिए प्रेमचंद जरूरी
प्रेमचंद साहित्यिक लोक चिंता के प्रस्थान बिंदु हैं। यदि युवा उनकी कृतियों को पढ़ने से वंचित हैं तो वह साहित्यिक समझ की पहली कड़ी से ही दूर है। प्रेमचंद की रचनाएं भले ही दशकों पहले रची गईं लेकिन समाज के प्रति इतनी गंभीर समझ के साथ की गईं कि वह आज के दौर के लिए भी पहले जितनी ही उपयोगी है। ऐसे में मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि यदि युवा उनकी कृतियों को नहीं पढ़ रहा तो यह उसके जीवन की बड़ी रिक्तता है। 
- डॉ. मुन्ना तिवारी, युवा साहित्यकार

संवेदना के लिए प्रेमचंद को पढ़ना होगा
बाजारवाद के चलते रोजगारपरक शिक्षा के चलन ने हमारी संस्कृति को गहरी चोट पहुंचायी है। साहित्य और कला क्षेत्र पर इसका सबसे ज्यादा असर हुआ। इसी का नतीजा है कि आज का युवा साहित्यिक रचनाओं से दूर होता जा रहा है। इसका गंभीर परिणाम समाज में संवेदनशीलता के ह्रास के रूप सामने आ रहा है। यदि समाज में संवेदनशीलता को बनाए रखना है तो नई पीढ़ी को हर हाल में प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों को पढ़ना ही होगा। 
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- डॉ. दीपक प्रकाश त्यागी, युवा साहित्यकार

 
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