गुलामी के पहले और गुलामी के दौरान का दर्द था तो गुलामी के बाद आजादी की खुली हवा की सासें भी थी। इन सबके बीच थी नसीहत, पश्चिमी सभ्यता से दूर रहने की। इसका गवाह बना गोरखपुर यूनिवर्सिटी का दीक्षा भवन, जहां रविवार को ‘बाबा का ख्वाब’ नाटक का मंचन किया गया। मंझे हुए कलाकारों की प्रस्तुति ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया और वे एक घंटा 10 मिनट की इस पेशगी को एकटक देखते रहे।
अभियान सामाजिक, सांस्कृतिक एवं रंगमंचीय संस्थान, राष्ट्रीय सेवा योजना व मानस एजुकेशन सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में प्रोडक्शन ओरिएंटेड थिएटर वर्कशाप के समापन पर आयोजित नाटक की शुरुआत समाजसेवी पीके लाहिड़ी के हाथों दीप प्रज्ज्वलन से हुई। नाटक में गुलामी से पहले, गुलामी के दौरान और आजादी के दौर के दृश्य प्रस्तुत किया गया। प्रस्तुति में दिखाया गया कि किस तरह पाश्चात्य संस्कृति ने हमारे संस्कार को अपनी सभ्यता में ढाला और देश पर कब्जा कर लिया।
नाटक का समापन बाबा की ओर से पोतियोें को दी गई इस नसीहत के साथ होता है कि कभी पश्चिमी सभ्यता को न अपनाना, क्योंकि वहां जाकर सूरज ढल जाता है। लेखक और निर्देशक शैलेंद्र तिवारी के इस नाटक को जीवंत बनाने में कलाकार आकाश, दीक्षा तिवारी, मृणाली, प्रीति, नेहा, सुमितेंद्र, ऋत्विक, वैभव, सत्यम, नीरज, अभिनव, अतुल, विपिन, बालेंद्र की मुख्य भूमिका रही।
मंच व प्रकाश सज्जा में सौरभ मल्ल, बैक स्टेज लाइट में देवेज्य श्रीवास्तव व संगीत में राज गौरव का सराहनीय योगदान रहा। अतिथियों का स्वागत डॉ. अजय कुमार शुक्ला ने और आभार ज्ञापन अभियान संस्था के अध्यक्ष श्रीनारायण पांडेय ने किया।