अदबो-सुखन की दुनिया में अपने निजामत के हुनर से अमर हो गए अनवर जलालपुरी को यह फन गोरखपुर से ही मिला था। इस माटी ने उन्हें वो उस्ताद दिया, जिसकी शागिर्दी ने उन्हें निखारकर अदबी जमात का आफताब बना डाला। मुशायरों और महफिलों में गोरखपुर से अपने इस ताल्लुक को वह गाहे-ब-गाहे बयां भी करते रहे। उस्ताद भी अपने इस मुरीद का जिक्र करने से नहीं चूके। अपनी एक किताब में उस्ताद उमर कुरैशी ने अनवर जलालपुरी को अपना अजीज शागिर्द बताया।
गोरखपुर यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में ‘उमर कुरैशी : हयात और कारनामे’ शीर्षक पर रिसर्च कर रहे शमशाद अहमद ने अपने शोध में दोनों शायरों के इस संबंध को शामिल किया है। शोध का निर्देशन कर रहे विभागाध्यक्ष डॉ. रजीउर रहमान बताते हैं कि उमर कुरैशी ने जब शेरों को संकलित करके शेरी मजमूए की शक्ल दी तो उसमें अनवर जलालपुरी से अपने गहरे रिश्ते को भी बयां किया। उमर कुरैशी अपने दौर में अदब के वह सितारे थे, जिनका नाम सुनकर बड़ी हस्तियां हर काम छोड़कर मुशायरा सुनने पहुंच जाती थीं। उनकी शायरी और निजामत के ऐसे ही दीवानों में मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार का भी जिक्र आता है। उमर कुरैशी की निजामत में फिराक गोरखपुरी जैसे बड़े शायरों की महफिल सजती थी।
ऐसे ही एक मुशायरे में उमर कुरैशी और अनवर जलालपुरी में गुरु-शिष्य का रिश्ता कायम हो गया। एक मुशायरे के दौरान अनवर जलालपुरी को बोलते सुना कि वह अपने उस्ताद उमर कुरैशी की नकल करते हैं। उमर कुरैशी में वह हुनर था जिसने निजामत को कला के तौर पर पहचान दिलाई। उनकी विरासत को अनवर जलालपुरी ने बेहद खूबसूरती से बुलंदी दी और खुद भी निजामत के फन के उस्ताद बन गए।
कई मंचों पर रहा उस्ताद और शागिर्द का साथ
कई मुशायरों में उस्ताद और शागिर्द एक मंच पर नजर आए। शहर में सजी एक अदबी महफिल भी दोनों के इस रिश्ते का गवाह रही। इस्लामियां कॉलेज ग्राउंड में 10 बरस पहले हुए आल इंडिया मुशायरे में उमर कुरैशी और अनवर जलालपुरी की जोड़ी मंच की जीनत थी। उस्ताद कुछ साल पहले जन्नतनशीं हुए तो अब अनवर जलालपुरी भी।