यूं तो सरकारी अस्पतालों में गरीब, लावारिस लोगों के लिए सभी सुविधाएं मुफ्त हैं, मगर इसे पाने के लिए भी पैरवी होनी चाहिए। मेडिकल कॉलेज में अफसरों के हस्तक्षेप के बाद लावारिस मरीजों को भर्ती तो कर लिया जा रहा है, मगर वहां उनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं होता। इस बीच अचानक उसके लापता होने पर अस्पताल प्रशासन बड़ी आसानी से यह कह देता है कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और वह चला गया। एक तरफ लावारिस मरीज की निगरानी कर्मचारी सही से करते नहीं और दूसरी तरफ उसके लापता होने की सूचना भी पुलिस को नहीं दी जा रही है।
मेडिकल कॉलेज में 36 घंटे तक शटर में बंद रहने के बाद एक युवक को एसआईसी के कहने पर सोमवार दोपहर सर्जिकल वार्ड में भर्ती किया गया था। किसी तरह उसका इलाज शुरू हुआ, मगर देर रात वह गायब हो गया। सुबह नर्स ने अस्पताल प्रशासन को यह जानकारी दे दी कि वह खुद से कहीं चला गया। कुछ ऐसा ही मामला कुछ दिन पहले भी सामने आया था। एक लावारिस महिला जो गेट पर तड़प रही थी उसे पुलिस के कहने पर भर्ती कर लिया गया। फिर अचानक वह महिला गायब हो गई। उस बार भी यही बताया गया कि महिला कहीं चली गई, जबकि उसे एड्स था और इंट्राकैप भी लगा था जो बेहद खतरनाक हो सकता है।
यह दो ताजे मामले हैं, जब मेडिकल कॉलेज में कर्मचारियों की लापरवाही से मरीज को सही इलाज नहीं मिल सका, जबकि एक लावारिस के इलाज और निगरानी दोनों की जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन की होती है।