छात्रसंघ चुनाव की तारीख तय करने के बाद प्रशासन की नामंजूरी से सकते में आए गोरखपुर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अब चुनाव को जिला प्रशासन के ऊपर छोड़ दिया है। कुलपति, रजिस्ट्रार आदि अधिकारियों के साथ चुनाव सेल की घंटे भर की माथापच्ची के बाद बुधवार को यह फैसला लिया गया। उधर, चुनाव तिथि की घोषणा से पिछले दो दिन से बढ़ी चुनावी सरगर्मी के बाद बदले परिदृश्य में बुधवार को यूनिवर्सिटी परिसर में सन्नाटा छाया रहा। न कहीं छात्रनेता नजर आए और न कहीं चुनावी हलचल।
दरअसल, शनिवार को बिना प्रशासनिक सहमति के ही यूनिवर्सिटी प्रशासन ने 16 सितंबर चुनाव की तारीख घोषित कर दी और उसके बाद सहमति के लिए एक पत्र प्रशासन को लिखकर चुनाव की तैयारी भी शुरू कर दी। चुनाव अधिकारी संजय बैजल ने तो आचार संहिता भी लागू होने की घोषणा कर दी, लेकिन जब 48 घंटे तक प्रशासन की ओर से कोई जवाब नहीं आया तो तैयारियों पर विराम लगता नजर आया। स्थिति को साफ करने के लिए मंगलवार की देर शाम चुनाव अधिकारी और प्रॉक्टर एसएसपी रामलाल वर्मा से मिलने पहुंचे, जहां उन्हें यह बताया कि यूनिवर्सिटी की ओर से तय तिथि पर चुनाव कराना संभव नहीं है।
एसएसपी ने उन्हें 20 से 30 सिंतबर के बीच चुनाव कराने की सलाह दी। प्रशासन की ओर से सुझाई गई चुनाव तिथि के दायरे में 25 सितंबर को होने वाला दीक्षांत समारोह आड़े आया तो प्रो. बैजल ने एसएसपी को साफ कर दिया कि उन तिथियों के बीच चुनाव संभव नहीं। नतीजा यह रहा कि मंगलवार की बातचीत में कोई सहमति नहीं बन सकी। यदि कुछ हुआ तो वह चुनाव टालने का फैसला।
चुनाव को लेकर उपजी असहज स्थिति का हल निकालने के लिए बुधवार को कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने बैठक बुलाई, जिसमें 11 सदस्यीय चुनाव कमेटी के अलावा रजिस्ट्रार अशोक कुमार अरविंद, वित्त नियंत्रक अतुल श्रीवास्तव, परीक्षा नियंत्रक डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह मंथन के लिए बैठे। घंटे भर चली बैठक में चुनाव तिथि की हर संभावना तलाशी गई लेकिन हर बार प्रशासनिक सहयोग की अड़चन आड़े आती दिखी। ऐसे में सारी जिम्मेदारी प्रशासन पर डालते हुए बैठक समाप्त कर दी गई।
यूनिवर्सिटी के इस रुख से चुनाव की संभावनाओं पर विराम लगता नजर आ रहा है। वजह है छात्रसंघ चुनाव को लेकर लिंगदोह समिति की सिफारिश। इसके मुताबिक सत्र शुरू होने के आठ सप्ताह के भीतर चुनाव प्रक्रिया संपन्न करा लेनी होगी और यह अवधि 16 सितंबर को ही पूरी हो जा रही है।